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रेशमी डोर रक्षा की कभी पिघलती नहीं।
मियाद हमारे प्रेम की कभी ढलती नहीं।।
तुम चाहे दूर रहो चाहे पास मेरे।
बहन की आस्था कभी बदलती नहीं।।
दिन का कोई पहर ऐसा नहीं भाई।
जब दुआ तेरी सलामती की पलती नहीं।।
हमेशा गुजर जाती हूं वहां से।
जहां तुझ संग जिंदगी कभी खलती नहीं।।
चमकीला है ये मौसम राखियों से।
कैसे कहूं वो जगमग मुझे छलती नहीं।।
उन राखियों में एक कलाई तेरी है।
यादों से मेरी ये सुखद आशा टलती नहीं।।
रक्षाबंधन के इस मनभावन पर्व पे।
तूझसे मिलने की भावना संभलती नहीं।।
देख तुझे तस्सली से भर जाती हूं।
तब दुखों में दीपशिखा सी जलती नहीं।।
मेरी राखी रिश्तों को मजबूत कर।
यादों में बसाए रखती है, फिसलती नहीं।।
मौलिक व स्वरचित -- कीर्ति रश्मि "नन्द ( वाराणसी)

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