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इस कविता के माध्यम से मैं अपनी उस सखी को याद करती हूं जो बचपन में ही मुझसे बिछड़ गईं थी। आज जाने वे कहां होंगी कैसी होंगी कुछ पता नहीं अब तो यादें ही शेष रह गईं हैं । 🍁🍁🍁
✍️जब भी में इस नीले गगन को देखती हूं,
तो इसमें मुझे नजर आता है तुम्हारा चेहरा,
भोला मासूम और उसपे एक निश्छल मुस्कान,
जो हमारी दोस्ती से सरोबार होती है।
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जब भी मैं किसी सुंदर फूल को देखती हूं,
तो लगता है इसकी कोमलता में तुम ही हो,
जिसे अनायास ही मुझसे बहुत कुछ कहना है,
और मैं जी भर के तुम्हें सुनना चाहती हूं।
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जब भी मैं इन उड़ते पंछियों को देखती हूं,
तो मुझे एक आजादी सी महसूस होती है,
ऐसी आजादी जिसमें मैं अपनी प्रिय सखी संग,
उड़ जाती हूं यादों की अनंत यात्रा पर ।
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जब भी मैं बारिश की बूंदों को देखती हूं,
तो, लगता है ये बूंदे हमारी आंखो के हैं,
इन्हें मुट्ठियों में भींच बस यही महसूस करती हूं,
परिस्थिति को, जिसने दूर कर दिया हमें।
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पर सखी हम दूर भले हों पर कहां दूर हैं,
आज भी एक सुगंधित समीर की भांति,
मेरे पास आती हो और मुझे छूकर चली जाती हो,
दोस्ती के एहसास को तरोताजा कर जाती हो।
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स्वरचित व मौलिक
-- कीर्ति रश्मि "नन्द ✍️
वाराणसी

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