धर्म और अधर्म की व्याख्या बहुत कठिन है। समय समय पर धर्म की परिभाषा बदलती रहती है। जो कल धर्म था, आज अधर्म हो सकता है। जो पहले अधर्म समझा जाता था, आज वही धर्म हो सकता है।
एक ही काल में विभिन्न परिस्थितियों में भी धर्म और अधर्म की व्याख्या बदलती रहती है। किसी को जान से मारने पर सजा का प्रावधान है। पर युद्ध में सैनिक कितने विरोधियों को मार देते हैं। यह उनका कर्तव्य है।
भगवान खुद यज्ञ स्वरूप कहे जाते हैं। खुद भगवान श्री राम ने अश्वमेध यज्ञ किया था। धर्म के अवतार कहे जाने बाले महाराज युधिष्ठिर ने भी अनेकों अश्वमेध यज्ञ किये थे। पर जब भगवान विष्णु ने भगवान बुद्ध के रूप में अवतार लिया तब अपनी ही पूर्व धारणा के विपरीत कहा। बलि प्रधान यज्ञों को बंद कराकर अहिंसा धर्म का प्रचार प्रसार किया।
यज्ञ और बलि का बहुत बड़ा संबंध है। अश्वमेध यज्ञ के विषय में प्रायः यही समझा जाता है कि यज्ञ के लिये राजा अश्व छोड़ता था। फिर जो भी उस अश्व को पकड़ता था, उसे युद्ध करना होता था। पर आखरी सत्य यह था कि यज्ञ की पूर्णाहुति उसी अश्व की बलि से होती थी। मेध शव्द का अर्थ ही बलि है।
किसी जीव की बलि चढाने से ईश्वर प्रसन्न होते हैं। उसके कष्टों को दूर कर देते हैं। ऐसी मान्यताओं पर लेखक को विश्वास नहीं है। लेखक तो यही समझता है कि सुख और दुख आते और जाते रहते हैं। बलिदान तो अहंकार का ही किया जाना चाहिये।
शायद मान्यताओं पर भी देश काल और परिवेश का असर होता है। यदि पुनर्जन्म की मान्यता सत्य है तो एक संभावना यह भी है कि उस काल में लेखक यदि मनुष्य के रूप में धरा पर था तब शायद वह भी इन बलि प्रधान यज्ञों का समर्थक रहा हो। एक संभावना यह भी है कि यदि लेखक का पुनर्जन्म किसी ऐसे समुदाय में हो जाये जहाँ आज भी विभिन्न अवसरों पर बलि दी जाती हों तो लेखक भी कोई विरोध न करे।
बताया जाता है कि लेखक के परिवार में भी जब पुत्र का जन्म होता था तब एक आटे के बने बकरे को पुत्र की माता चाकू से काटा करती थी। पर लेखक के जन्म के अवसर पर लेखक की माता जी ने इस तरह की सांकेतिक बलि देने से मना कर दिया। इस बात की पूर्ण संभावना है कि किसी काल में लेखक के पूर्वज भी पुत्र जन्म के अवसर पर तथा अन्य अवसरों पर बलि दिया करते होंगें।
सौराष्ट्र में पंद्रह वर्षों से अकाल पड़ रहा था। आपत धर्म के रूप में महाराज सत्यव्रत नरमेध यज्ञ करना चाह रहे थे। जिस मुनादी को सुनकर राजकुमार सुबाहु में मन में छिपा क्षत्रिय जग गया था वह कुछ इस तरह थी।
" सौराष्ट्र के वीरों। आपने अनेकों बार अपनी मात्रभूमि की लाज रखी है। आज फिर आपकी आवश्यकता है। है कोई मात्रभूमि के लिये अपने प्राणों को भी बलिदान करने बाला युवा जो अपनी इच्छा से नरमेध यज्ञ की बलि बनना स्वीकार कर ले। है कोई पिता जो खुद अपने युवा पुत्र को राजदरबार लाकर कह सके कि यही होगा सौराष्ट्र को बचाने बाला योद्धा। है कोई माता जो अपने पुत्र को बलि के लिये उसी तरह भेज सके जैसे एक क्षत्राणी अपने पुत्र को रणभूमि के लिये भेज देती है। "
आधुनिक भारत में भी भारत की आजादी के लिये कितनों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी। निश्चित ही ऐसा अविश्वास करने का कोई आधार नहीं है कि महाराज को मुनादी के बाद भी सौराष्ट्र पर अपने प्राण अर्पित करने बाला कोई न मिलता। वह समय तो देश के लिये प्राणों की आहुति देने का ही था। यह दूसरी बात है देश की परिभाषा मात्र सौराष्ट्र तक सीमित थी।
घर घर में युवा मात्रभूमि पर प्राण अर्पित करने के लिये अपने माता पिता से आज्ञा मांग रहे थे। माताएं अपने शोक को भीतर ही रखकर अपने पुत्रों को क्षत्रिय धर्म की शिक्षा दे रही थीं। पर वह बलिदान किसी के भाग्य में न था। ऐसा बलिदान तो राजकुमार सुबाहु ही देंगें। आखिर वही तो देश के राजकुमार हैं।
मंत्री, सेनापति, दरबारी तथा दूसरे भी अनेकों प्रजा महाराज से अनुरोध कर रहे थे। महाराज। ऐसा न करें। अपने एकमात्र पुत्र को बलि न चढायें। ईश्वर की कृपा से हम अनेकों पुत्रों के पिता हैं। यदि एक पुत्र मात्रभूमि के काम आ गया तब भी हम पुत्रवान रहेंगे।
पर आज महाराज ज्यादा कठोर थे। राजा को कभी भी अपनी चिंता नहीं करनी चाहिये। राजा का पुत्र हमेंशा राज्य के मान के लिये कुर्बानी देने के लिये बना होता है।
अनेकों माताएं महारानी चित्रसेना से अनुरोध कर रही थीं। पर चित्रसेना अब राजकुमार सुबाहु की माता न थी। भले ही मन में अपने पुत्र के लिये कितने भी आंसू बहा रही हों पर ऊपर से महारानी का ही कर्तव्य निभा रही थीं। जब एक महारानी अपने पुत्र को आशीर्वाद देकर रणभूमि में विदा करती है फिर राजकुमार को रणभूमि छोड़कर वापस आने को नहीं कहती है। या तो राजकुमार रण जीतकर वापस आता है या वहीं शहीद हो जाता है।
रणभूमि में तो भविष्य अनिश्चित है। एक आशा यह भी रहती है कि योद्धा शायद रणभूमि से विजयी होकर वापस आयेगा। पर जिस रणभूमि में राजकुमार सुबाहु अपने प्राण अर्पित करने जा रहे हैं, उसमें उनके जीवित वापस आने की बहुत कम संभावना है।
शव्द बहुत कम कुछ विशेष अर्थ रखता है। प्राचीन कथा के अनुसार इतिहास में केवल एक बार ही यह यज्ञ किया गया है। उस समय एक ब्राह्मण पुत्र ने अपनी इच्छा से बलि बनना स्वीकार किया था। पर जब उस कुमार की बलि चढाई जा रही थी, ठीक उसी समय देवराज इंद्र प्रसन्न हो गये। उन्होंने बलि रुकबा दी थी। बिना बालक की बलि लिये नरमेध का फल दे दिया था। सभी प्राकृतिक आपदाओं को दूर कर दिया था।
इसी लिये नरमेध यज्ञ एक रणभूमि ही है। पता नहीं कि बलि से पूर्व ही देवता प्रसन्न होकर राजकुमार के प्राणों की रक्षा कर लें। या राजकुमार बलि के रूप में अपने प्राण गवा देगा। यह तो बलि के रूप में उपस्थित राजकुमार के निश्चय पर निर्भर करता है। यदि एक बार भी उसके मन में जिंदा रहने की इच्छा हुई तो निश्चित ही वह बलि पर अपने प्राण गंवा देगा। यदि अंत तक उसका मन मात्रभूमि के लिये प्राणों को अर्पित करने की लालसा लिये रहा तो खुद देवता उसके प्राणों की रक्षा करेंगे।
सात पवित्र नदियों के जल से स्नान करकर, नवीन वस्त्र पहनकर, पूर्ण श्रंगार करकर जब राजकुमार सुबाहु यज्ञ भूमि में आये तो अनेकों की आंखें नम हो गयीं। यही यज्ञ भूमि राजकुमार के जीवन की पहली रणभूमि बनेगी। इस रणभूमि में उनका सामना मन की कमजोरियों से होगा।
महाराज सत्यव्रत और महारानी चित्रसेना यज्ञ में दीक्षित होकर अग्नि में आहुति देने लगे। दोनों जानते थे कि इस यज्ञ की आखरी आहुति उनके उस इकलौते पुत्र की होगी जिसको उन्होंने बहुत कठिनाइयों से मुनि कर्दभ की सेवा से पाया था। वह पुत्र जो उनके जीवन का आधार था, संभवतः इसी यज्ञ की अग्नि में अपने प्राण गंवा दे। मन में शोक का भले ही तूफान भरा था पर दोनों ही अपने धर्म पर अविचल थे।
अद्भुत बात यह थी कि यज्ञ करा रहे ब्राह्मण ऐसे वाक्य बोल रहे थे जिन्हें सुनकर किसी को भी जीवन से मोह हो जाये। मनुष्य को किसी भी तरह अपने जीवन की रक्षा करनी चाहिये। जीवन बचने पर धन फिर से कमाया जा सकता है। जीवित व्यक्ति ही धर्म कर्म कर सकता है। तो जीवन ही मुख्य है। यदि बलिवेदी पर बैठा हुआ कोई अपने प्राण बचाने के लिये भाग भी जाये तो वह क्या गलत करेगा। किसी दूसरे राजा के राज्य में छिप जाये तो भी क्या गलत करता है। जीवन है तो सब कुछ है।
यज्ञ की सभी आहुतियां पूर्ण हुईं। अब आखरी आहुति राजकुमार की शेष थी। महाराज और महारानी दोनों राजकुमार को यज्ञ अग्नि के नजदीक ले गये। खुद के फायदे के लिये किसी अन्य के पुत्र की बलि देने बाले पापी आज भी यदाकदा मिल जाते हैं। पर राज्य के लिये अपने ही पुत्र की यज्ञ में पूर्णाहुति देने बाले बहुत विरले होते हैं।
" राजकुमार। अब आप यज्ञ वेदी पर पूर्णाहुति के लिये तैयार किये गये हों। सच सच बताओं कि क्या तुम्हें जीवन से मोह नहीं है। क्या तुम जीना नहीं चाहते।"
यज्ञ कराने बाले मुख्य ब्राह्मण ने आखरी बार पूछा।
राजकुमार कुछ समय शांत रहा। यज्ञ की बेदी पर झूठ तो नहीं कह सकते।
" यज्ञ कराने में प्रवीण यज्ञनिष्ठ ब्राह्मणों। अब मैं असत्य नहीं कह सकता हूं। यह सर्वथा गलत है कि मेरी इच्छा जीवित रहने की नहीं है। मैं निश्चित जीवित रहना चाहता हूं। पर जरूरी नहीं कि वह इस शरीर से। मैं अमर बनना चाहता हूं पर यश रूपी शरीर से।
श्रेष्ठ ब्राह्मणों। मैं यही मानता आया हूं कि मात्रभुमि के लिये अपने प्राण अर्पित करने बाले कभी मरते नहीं है। वह यश रूपी शरीर से अमर हो जाते हैं। युगों युगों तक मानवता को राह दिखाते हैं।
मैं भी अमर बनना चाहता हूं। आज मेरी मृत्यु तो नहीं होगी। मैं अमर बनूंगा। सौराष्ट्र के हर नागरिक के मन में जिंदा रहूंगा। उन्हें देश के लिये मर मिटने का पाठ पढाता रहूंगा।
यही सत्य है। यही सत्य है। यही सत्य है। "
अचानक आसमान से ढोल और नगाढे बजने लगे। देवराज इंंद्र सहित अनेकों देव प्रगट हो गये। रणभूमि में राजकुमार विजयी हुए।
" राजकुमार सुबाहु। आप जैसा त्याग शायद ही कोई कर सके। महाराज सत्यव्रत और महारानी चित्रसेना जैसा प्रजाबत्सल शासक इस धरा पर तो दुर्लभ है। जिस राज्य में ऐसे राजा, रानी और राजकुमार हों, उस राज्य से भला देव केसे रूठे रह सकते हैं। अब इस यज्ञ की अग्नि बारिश के जल से ही शांत होगी। जब तक राजकुमार सुवाहु इस धरा पर हैं, तब तक सौराष्ट्र में कभी भी कोई प्राकृतिक आपदा नहीं आयेगी। सर्दी, गर्मी और वर्षा सब उचित रूप में होंगें। राजकुमार पर देवों की कृपा हमेशा रहेगी। "
देवराज इंद्र के इतना कहने से के साथ ही नरमेध यज्ञ का समापन हो गया। थोड़ी ही देर में आसमान में बादल छा गये। पहले धीमे धीमे और फिर मूसलाधार बारिश हुई। सौराष्ट्र की जनता खुशी से नृत्य करने लगी। पर क्या वह खुशी मात्र बारिश होने की थी। बिलकुल नहीं। जिस देश के राजा, रानी और राजकुमार भी देश के लिये अपने प्राण भी दाव पर लगा सकें, देश के लिये अपना सर्वस्व ही न्यौछावर कर दें, उस देश की जनता की खुशी बहुत कुछ आंतरिक और आध्यात्मिक होती है।
देवों के आशीर्वाद के बाद फिर कभी राजकुमार सुबाहु अस्त्र शस्त्रों के अभ्यास करने में कमजोर नहीं पड़े और शीघ्र ही महावीर योद्धा बन गये। युवराज के रूप में तथा बाद में सौराष्ट्र नरेश के रूप में उन्होंने सौराष्ट्र के मान के लिये अनेकों युद्धों का नैत्रत्व किया। पर जिस रणभूमि में उन्होंने मात्र पंद्रह वर्ष की आयु में ही सौराष्ट्र को विजय दिलाई थी, उसके समक्ष तो बड़े से बड़े योद्धा द्वारा लड़ा गया बड़ा सा बड़ा युद्ध भी कम ही रहेगा।
समाप्त
पाठकों से निवेदन
(१) बताना चाहता हूँ कि यह पूरी कहानी काल्पनिक है। किसी भी पात्र या घटना का किसी भी ऐतिहासिक या पौराणिक घटना से कोई संबंध नहीं है। केवल ब्राह्मण पुत्र द्वारा खुद को बलि के लिये प्रस्तुत करने का जो उदाहरण दिया है, वही पौराणिक तथ्य है।
(२) व्यक्तिगत रूप में लेखक किसी भी तरह की बलि और जीव हिंसा का समर्थक नहीं है।
(३) जो पाठक इस धारावाहिक के भागों को नियमित रूप से पढते आये हैं, उनसे निवेदन है कि इस भाग की समीक्षा में अवश्य बतायें कि क्या उन्हें कहानी के इस तरह से अंत का कोई अनुमान था।
समाप्त
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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