शहर सुरक्षित नहीं है लखनवी दियो बताय 
न जाने किस राह मे लरिका जाय पिटाय 
लरिका जाय पिटाय खाय थप्पड़ पर थप्पड़ 
कह लखनवी कविराय अब काहू से ना लड़ 

"लखनवी" सीधे जाइये, रख अपने काम से काम 
इधर उधर न ताकिये, हो जाओगे बदनाम 
हो जाओगे बदनाम, होगा गुत्थिम गुत्था 
इधर पड़ेगा थप्पड़, उधर पड़ेगा जूता 


इस तरह की बेइज्जती, कोउ देख न पाए 
संस्कार माँ बाप के, जो नहीं वो हाँथ उठाए 
जो नहीं वो हाँथ उठाए, रह गया उसका सम्मान 
इखलाक ही बस, बन गयी उसकी पहचान 


चलते चलते रुक गया, लगी न एक भी खरोंच 
खिसियानी बिलरिया फिर  रही है खम्भा नोंच 
रही है खम्भा नोंच, नियम का पाठ पढ़ाए 
खुद पर रख न संयम, नियम सब भूल ही जाए 
मुकेश लखनवी