मन को जीतना अत्यंत दुश्कर कहा जाता है। जैसे वायु को वश में करना लगभग असंभव है, उसी तरह मन के वेगों को रोकना अति कठिन है। लगातार अभ्यास ही वह सूत्र है जिससे मन वश में हो पाता है।
अनेकों बार मन में उठा वैर भाव सही और गलत का विवेक ही नष्ट कर देता है। फिर कुछ ऐसा हो जाता है जो शायद नहीं होना चाहिये। अथवा शायद यह सोचना भी गलत है। होता वही है जो होना चाहिये। भले ही जो हुआ, वह सांसारिक दृष्टि से गलत लगे पर क्या संसार की दृष्टि से ही सही और गलत का निर्धारण किया जा सकता है।
होना चाहिये था कि सुधन्वा की वीरता से मुग्ध होकर अर्जुन को उसे गले लगा लेना चाहिये था। वैसे भी वह कुछ समय पूर्व उसे अपने पुत्र की ही भांति देख रहे थे। चक्रवर्ती महाराज युधिष्ठिर के दरवार में सुधन्वा को कोई बड़ा पद दिलाना चाहिये था। आखिर जिस बात का विवाद था, खुद भगवान श्री कृष्ण के आगमन से वह समाप्त हो चुका था। यज्ञ का अश्व अब निश्चित ही प्राप्त हो जायेगा। फिर यदि जरा सा तारीफ करने से हस्तिनापुर नरेश को सुधन्वा जैसे वीर की सेवाएं मिल सकती हैं तो इसमें बुरा तो कुछ नहीं था।
पर हुआ वह जो शायद विधाता ने पहले से ही निश्चित कर रखा था। हुआ वह कि सुधन्वा अपनी जीवन त्यागकर भी अपनी भक्ति का परिचम लहरा गया। हुआ यह कि भक्त और भगवान का मिलन हो गया। हुआ वही जो आध्यात्मिक दृष्टि से सुधन्वा के लिये ज्यादा हितकर था।
भगवान श्री कृष्ण के आगमन से भले ही रण की परिणति शांति के साथ हो गयी। पर अनेकों वर्षों से अर्जित अर्जुन की प्रतिष्ठा तो एक बालक से हारकर नष्ट हो चुकी थी। अपमान की दुर्भावना से अर्जुन का मन दग्ध था। और अचानक ही वह अपने तरकश से तीन वाण बाहर निकाल कहने लगे।
". केशव। यह सत्य ही है कि मेरे बल केवल आप हो। आपके साथ से ही मेंने अनेकों बार पितामह, गुरु द्रोण, कर्ण, अश्वत्थामा जैसे वीरों को हराया था। आज फिर से संसार देखेगा कि श्री कृष्ण का साथ मिलने पर अर्जुन अजेय है। यदि इन तीन वाणों से इस युवक का मस्तक मेंने काट नहीं दिया तो मुझे सबसे बड़े पापियों की गति प्राप्त हो। मेरे पितर भी दुर्गति को प्राप्त हों। हालांकि ऐसा होगा नहीं। क्योंकि अब मेरे साथ मेरे मित्र और मेरे आराध्य हैं। अरे युवक। यदि तुम पाताल में भी छिप जाओ तो भी अब इन वाणों से बच नहीं सकते। अब तुम्हारे जीवन का अंत ही है। "
अर्जुन की प्रतिज्ञा सुन चंपकपुरी के वीर योद्धा शोक समुद्र में डूबने लगे। बस सुधन्वा ही निश्चिंत खड़ा भगवान श्री कृष्ण की रूप माधुरी का दर्शन कर रहा था। भक्त को भला मृत्यु से कैसा भय। कुछ देर अपने आराध्य का दर्शन कर उन्हीं को प्रणाम कर वीर और उससे भी अधिक भक्त सुधन्वा बोला।
" वीर अर्जुन। आप धन्य हैं। आपकी रक्षा के लिये खुद जगती के सृष्टिकर्ता तत्पर रहते हैं। इन्होने अनेकों बार आपके प्रण की रक्षा की है। मैं भी इनका एक छोटा सा भक्त हूं। मैं समझता हूं कि जीवन अनित्य ही है। जो भी संसार में आता है, वह एक न एक दिन संसार त्यागता भी है। यदि यह सत्य है कि प्रभु श्री कृष्ण ही मेरे आराध्य हैं तो मैं आपके इन तीनों वाणों को दो टुकड़ों में काट दूंगा। यदि ऐसा न कर पाया तो ईश्वर मुझे अपनी माता, बहन और पत्नी के साथ भी कुकर्म करने बाले पापियों की गति प्रदान करें। "
भगवान श्री कृष्ण के दो भक्त उन्हीं की भक्ति का आसरा लेकर दो विपरीत प्रण कर चुके थे। अपने भक्तों के प्रण की रक्षा करने बाले भगवान श्री कृष्ण की दशा दोराहे पर खड़े पथिक की भांति थी। भक्तों के लिये धर्म संकट की स्थिति तो बहुत सुनी है पर अब धर्म संकट की स्थिति में खुद भगवान थे।
" पार्थ। अक्सर आप बिना सलाह के प्रतिज्ञा कर लेते हों। क्या आपको पता है कि इस युवक की शक्ति क्या है।"
" नहीं केशव। पर मेरी शक्ति तो आप ही हों। आपके बलबूते ही मेंने यह प्रतिज्ञा की है।" श्री कृष्ण के पूछने पर अर्जुन का संक्षिप्त उत्तर।
" पार्थ। यह युवक एकपत्नी व्रती है। इसने अपने पूरे जीवन में केवल एक ही स्त्री से विवाह किया है। उसके अतिरिक्त किसी अन्य स्त्री का चिंतन भी नहीं किया है। जिस तरह केवल अपने ही पति से प्रेम करने बाली पतिव्रता स्त्री अपराजेय शक्तियों की स्वामिनी हो जाती है। उस सती स्त्री के वचनों की काट खुद ईश्वर के पास भी नहीं होती है। इसी तरह एकपत्नी व्रत का पालन करने बाले नर भी अपराजेय होते हैं। फिर सुधन्वा भी मेरा परम भक्त है। एकपत्नी व्रत के विषय में तो मैं और तुम दोनों ही सुधन्वा की बराबरी नहीं कर सकते।
अब तुमने प्रतिज्ञा कर ली है तो उसकी रक्षा करनी ही होगी। दूसरी तरफ सुधन्वा की प्रतिज्ञा भी पूर्ण करनी है। पर उससे पूर्व जगत को एकपत्नी व्रत की शक्ति दिखा देता हूं।
एक बार देवराज इंद्र घमंड में चूर होकर संपूर्ण ब्रज को नष्ट करना चाह रहे थे। उस समय मेंने अपनी अंगुली पर गोवर्धन उठाकर लाखों की संख्या में मनुष्यों और गौधन की रक्षा की थी। मेरी गोवर्धन धारण की लीला का गान करने बाले भक्त असीम सुख की प्राप्ति करते हैं। उस लीला का संपूर्ण पुण्य तुम्हारे पहले वाण को देता हूं। "
अर्जुन ने पहला वाण छोड़ा। दूसरी तरफ सुधन्वा ने अपने आराध्य का नामोच्चारण किया। सुधन्वा के वाण ने अर्जुन का वह वाण जिसको भगवान श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाने का पुण्य दिया था, दो टुकडों में काट दिया।
अर्जुन के अगले वाण को भगवान श्री कृष्ण ने कृष्णावतार के अनेकों पुण्य अर्पित किये। पर घोर आश्चर्य की बात, एकपत्नी व्रती सुधन्वा के तीर ने अर्जुन के उस तीर के भी दो टुकड़े कर दिये जिसकी शक्ति भगवान श्री कृष्ण के अवतार के अनेकों पुण्य थे।
जब भगवान श्री कृष्ण ने भगवान राम के रूप में अवतार लिया था, उस समय उन्होंने पूरे जीवन एकपत्नी व्रत का पालन किया था। अर्जुन के तीसरे तीर पर भगवान श्री कृष्ण ने वही पुण्य अर्पित किया। तथा खुद भी वाण के अग्र भाग पर स्थित हो गये।
भक्त अर्जुन के प्रण की रक्षा के लिये भगवान श्री कृष्ण ने रामावतार का वह पुण्य अर्पित कर दिया जो अब इस वाण को सुधन्वा के बाण के बराबर बना सकता है। पर क्या भगवान श्री कृष्ण केवल अर्जुन के प्रण की ही रक्षा करेंगें। रक्षा तो दोनों ही भक्तों के प्रण की करनी होगी।
" अर्जुन। आप धन्य हैं। जो आपके प्रण की रक्षा के लिये स्वयं द्वारिकाधीश अपने पुण्य अर्पित कर रहे हैं। पर मैं भी उन्हीं द्वारिकाधीश का भक्त हूं। मेरा यह वाण आपके इस वाण को भी दो टुकड़ों में काट देगा।"
सुधन्वा की बात सही रही। सुधन्वा के वाण से अर्जुन का वाण दो टुकड़ों में टूट गया। आकाश से देवता भी सुधन्वा को पुष्पों की वर्षा करने लगे। चारों तरफ सुधन्वा की जय जयकार होने लगी। आखिर उसने अर्जुन के उन तीन तीरों को दो टुकड़ों में काटा था जिनको खुद चंपकपुरी के आराध्य ने अपने अवतारों के पुण्य अर्पित किये थे।
पर रामावतार के एकपत्नी व्रत की शक्ति से शक्तिमान अर्जुन का तीसरा तीर दो टुकड़ों में कटकर भी भूमि पर नहीं गिरा। तीर का आगे का हिस्सा अपने लक्ष्य की तरफ बढता रहा। भक्त सुधन्वा को मोक्ष देने की कामना से, भक्त का भगवान से मिलन की कामना से, एकपत्नी व्रत के महात्म्य को संसार को दिखाने की कामना से, भक्त सुधन्वा की कीर्ति को अमर करने की कामना से वह दो टुकड़ों में विभक्त वाण भी आगे बढता रहा। उस कटे हुए वाण ने भक्त सुधन्वा का मस्तक धड़ से अलग कर दिया। सुधन्वा का वह मस्तक विज्ञान के सारे सिद्धांतों को तोड़कर खुद भगवान श्री कृष्ण की गोद में गिरा। सुधन्वा के शरीर से एक दिव्य तेज निकला जो भगवान श्री कृष्ण के शरीर में ही समा गया। भक्त और भगवान एक ही हो गये।
एकपत्नी व्रत का पालन करने बाले चंपकपुरी के वीरों से अर्जुन भी पार नहीं पा पाये। चंपकपुरी के वीरों ने वाध्य कर दिया कि खुद भगवान श्री कृष्ण उन्हें दर्शन देने आ पहुंचे। वीर सुधन्वा की वीरगति के बाद यदि किसी की आंखों में आंसू थे तो वह थे केवल अर्जुन। खुद भगवान को भी अपनी भक्ति से झुका देने बाले तथा सभी के समक्ष अपने आराध्य को प्राप्त करने बाले भक्त सुधन्वा की सुगति पर भला उनके परिजन कैसे अश्रु बहा सकते थे।
महाराज युधिष्ठिर का अश्वमेध यज्ञ पूर्ण हुआ। उचित समय पर राजकुमारी प्रभावती ने अपने पति सुधन्वा के अंश एक पुत्र को जन्म दिया। जिसको पालन पौषण, संस्कारित करने के अलावा द्वारिकाधीश भगवान श्री कृष्ण की भक्ति का पाठ पढाने में प्रभावती ने अपना जीवन व्यतीत कर दिया।
समाप्त
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

0 टिप्पणियाँ