उस दिन चंपकपुरी का राजदरबार देर रात तक खुला था। अर्जुन जैसे महावीर को चुनौती देने के बाद भी किसी के चेहरे पर भय की कोई रेखा भी नहीं थी। सभी के दिल में एक अलग ही उत्साह था। भगवान से मिलन की आस में सभी अपने प्राण भी दाव पर लगाने को तैयार थे।
महाराज हंसध्वज ने बोलना शुरू किया।
" चंपकपुरी के वीरों। संसार में युद्ध तो अनेकों हुए हैं। राज्य के लिये, स्त्री के लिये, स्वाभिमान के लिये कितनी ही लड़ाइयां लड़ी गयी हैं। पर इनमें से कुछ भी किसी के साथ नहीं जाता है। मनुष्य के साथ केवल उसके कर्म ही जाते हैं।
हमें ईश्वर के दर्शन करने हैं। हमें अपना जीवन संवारना है। ऐसी कोई लड़ाई इतिहास में सुनी नहीं गयी।
आज हमारे भाग्य में ऐसा समय आया है कि हम लड़ाई के माध्यम से भी अविनाशी ईश्वर के साकार रूप भगवान द्वारिकाधीश श्री कृष्ण का दर्शन पा सकते हैं। अपना और अपने परिवार का जीवन संवार सकते हैं।
हमारा सामना विश्व के सर्वश्रेष्ठ योद्धा से है। अर्जुन ने अनेकों वीरों को युद्ध में हराया है। पर हम मनसा अपने आराध्य के दर्शनों के लिये युद्ध करेंगें तो फिर ऐसी कोई संभावना ही नहीं है कि हम यह युद्ध हार जायें।
अर्जुन भगवान श्री कृष्ण के न केवल मित्र हैं अपितु उनके भक्त भी हैं। भगवान श्री कृष्ण को अर्जुन की सहायता के लिये आने के लिये हमने बाध्य कर दिया तो निश्चित ही हम सभी का जीवन सफल बन जायेगा।
निश्चित ही हमारी चंपकपुरी का कोई भी वीर अपने प्राणों से मोह नहीं रखता है। फिर भी यदि किसी को भगवान श्री कृष्ण के दर्शनों से बढकर अपने प्राण प्रिय हैं तो भी वह अपने प्राण बचा नहीं पायेगा। मैं चंपकपुरी का नरेश हंसध्वज प्रतिज्ञा करता हूं कि कल सूर्योदय जो भी योद्धा युद्ध के लिये तैयार होकर नहीं आयेगा, उसे खौलते हुए तेल की कढाई में फेंक दिया जायेगा। "
चंपकपुरी के वीरों की जयनाद से आसमान गूंजने लगा। किसी को भी अपने प्राणों का भय नहीं था। ऐसी कोई संभावना भी नहीं थी कि कोई ऐसी स्थिति भी आ सकती है कि युद्ध से पूर्व ही कोई इस तरह मृत्यु दंड को प्राप्त होगा। वैसे भी चंपकपुरी के वीर युवक हमेशा प्राणों को दाव पर लगाने को तैयार रहते थे।
पर युद्ध भूमि में विलंब से पहुंचने के प्राणों के भय के अतिरिक्त अन्य कारण भी हो सकते हैं। चार धाम यात्रा से पूर्व भी सारे कर्तव्यों को पूर्ण कर लेने का नियम है। भगवान श्री कृष्ण को पाने के लिये किया गया युद्ध भी किसी चारधाम यात्रा से कम नहीं होता है। युद्ध तो वैसे भी अनिश्चितता से भरा रहता है। अनेकों बार ईश्वर भक्तों को भी धर्म संकट की स्थिति से गुजरना होता है। ऐसी धर्म संकट की स्थिति में चंपकपुरी का एक प्रमुख योद्धा और भगवान श्री कृष्ण का परमभक्त ही यदि किसी अपरिहार्य कारण से विलंब से पहुंचे तो फिर खुद भगवान को ही अपने भक्त के जीवन की रक्षा करनी होती है। आखिर जिस भक्त के बलबूते उन्होंने इतना बड़ा उपक्रम कर दिया, उसको तो उद्देश्य की प्राप्ति तक जीवित रखना ही होगा।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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