सूर्योदय से पूर्व ही चंपकपुरी के सारे वीर योद्धा युद्ध के लिये उपस्थित हो गये। पर राजकुमार सुधन्वा का कहीं पता नहीं था। जैसे जैसे समय बढता गया , महाराज हंसध्वज का मन विचारों की आंधियों से जूझने लगा। अभी तो समय था। मन ही मन पुत्र के आगमन के लिये ईश्वर से प्रार्थना करने लगे। पर जैसे ही भगवान सूर्य ने धरती पर अपनी पहली नजर डाली, महाराज हंसध्वज की आशा निराशा में बदल गयी।
वैसे महाराज हंसध्वज चंपकपुरी के राजा थे। राज्य में राजतंत्र की व्यवस्था थी। पर उन दिनों राजतंत्र वर्तमान के प्रजातंत्र से कुछ बेहतर ही था। जहाँ आज के राजनैतिज्ञ किसी भी तरह खुद को तथा अपनी संतान को फायदा देना जानते हैं, उन दिनों किसी भी प्रजाबत्सल राजा के लिये यह संभव न था। राजा के मुख से निकला वचन प्रायः पत्थर की लकीर बन जाता। जिसे पूरा करने के मध्य उनका कोई प्रेमी भी बीच में नहीं आ सकता था।
आज जब एक राजा का प्रिय पुत्र ही उनके वचनों की आग में जलने बाला था तो मन ही मन वही सबसे ज्यादा रो रहा था। हालांकि महाराज अच्छी तरह जानते थे कि राजकुमार सुधन्वा यदि समय से उपस्थित नहीं हुआ है तो इसके पीछे भी कोई तार्किक बजह है। राजकुमार का समय तक आगमन न होना यही दर्शाता है कि वह राज्य की प्रजा के उत्थान के लिये ही कुछ करने में व्यस्त हैं।
मन की अपार पीड़ा को मन में ही दबाकर ऊपर से राजधर्म निभाना बहुत कठिन होता है। ऊपर से महाराज हंसध्वज का चेहरा क्रोध से लाल दिख रहा था। अचानक उन्होंने अपने सेनापति सुदर्शन को आज्ञा दी।
" सेनापति। कितने दुख की बात है कि वह कायर जिसे अपने प्राणों का भय है, मेरा पुत्र ही निकला। लगता है कि वह प्राण बचाने के लिये कहीं राज्य से भागने का प्रयास कर रहा है। अभी उस कायर सुधन्वा को पकड़कर मेरे पास लेकर आओ ताकि मैं भी सिद्ध कर सकूं कि मेरे अपनी प्रजा और पुत्र में कोई भी भेद नहीं है। "
पर सैनिकों को राजकुमार को गिरफ्तार करने के लिये जाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। राजकुमार सुधन्वा कोई कायर तो नहीं था। वह खुद आ पहुंचा। आते ही कुछ बिलंब का कारण बताया और क्षमा मांगी । उपस्थित सभी वीर योद्धा यही चाहते थे कि राजकुमार सुधन्वा को क्षमा कर दिया जाये। अभी कोई ज्यादा देर भी नहीं है। राजकुमार एक वीर योद्धा रहे हैं। रण में वह अपने पराक्रम से महावीर अर्जुन की सेना को खदेड़ सकते हैं।
कुछ देर राजा हंसध्वज किंकर्तव्यविमूढ़ रहे। लगता है कि एक पिता एक राजा के व्यक्तित्व पर हावी हो रहा था। एक पिता वह उपाय चाहता था कि किस तरह उसके पुत्र की रक्षा हो सके। पर खुद को राजा के कर्तव्य की बेड़ियों में बंधा असमर्थ पा रहा था। ऐसे समय में केवल गुरुदेव शंख और लिखित ही कोई राह दिखा सकते हैं। उनकी आज्ञा से सभी वीरों को मत प्रगट करने को कहा जा सकता है। पर शायद राजा की यही भूल थी। मुनि शंख और लिखित जो नियमों में खुद इतना बंधे थे कि चोरी के अपराध का दंड खुद मांगें, भला किस तरह एक पिता के मन की व्यथा को समझ सकते थे। राजा के अनुरोध पर दोनों गुरु गुस्से में सूर्योदय के समय के भगवान सूर्य की तरह लाल हो गये। लगा कि इस समय तीन भगवान सूर्य उदित हुए हों। एक आसमान में तथा दो धरा पर।
" महाराज। क्या कोई सामान्य प्रजा का वीर देरी से आता तो क्या आप उसके प्रति भी यही विचार रखते। निश्चित ही नहीं। फिर खुद के पुत्र के लिये मन में इतनी उदारता। लगता है कि आप अपना राजधर्म भूल गये हैं। आपने जल्दबाजी में प्रतिज्ञा कर ली। यह आपका दोष है। पर इस तरह एक बार प्रतिज्ञा करने के बाद आप पीछे नहीं हट सकते।
वैसे भी हम तो राजकुमार के तर्क से भी सहमत नहीं हैं। इस तरह कामोत्तेजना में अपने कर्तव्य को भूलने बाले अपनी लापरवाही को अपना कर्तव्य भी कितनी आसानी से बता देते हैं।
महाराज। राजकुमार सुधन्वा कोई धर्म नहीं निभा रहा था। उसे नियमानुसार मृत्यु दंड मिलना ही चाहिये। एक राजा के जीवन में अनेकों बार ऐसे अवसर आते हैं कि उसे अपने मन के प्रतिकूल करना होता है। फिर भी राजा करता है। राजा कोई साधारण पुरुष नहीं है। वह धरती पर ईश्वर का रूप कहा जाता है। असंभव को संभव करने बाला होता है। "
गुरुदेवों के निर्णय के बाद अब किसी से उम्मीद नहीं की जा सकती। पर सुधन्वा को उम्मीद थी। सुधन्वा को उम्मीद थी कि उसके आराध्य अभी भी उसकी रक्षा करेंगें। वह उच्च स्वर में बोलने लगा।
" हे नंदनंदन, द्वारिकाधीश, मधुसूदन, मेरे आराध्य भगवान श्री कृष्ण। मैं क्षत्रिय हूं। हमेशा अपने प्राणों की बाजी लगाने को तैयार रहता हूं। पर इस तरह तो नहीं। भक्तों की पुकार पर नंगे पैर आने बाले भक्तबत्सल। मेरी रक्षा कीजिये ताकि मैं अपने तीखे वाणों से आपके भक्त और सखा अर्जुन की रणभूमि में सेवा कर सकूं। अर्जुन को बाध्य कर सकूं कि वह आपको याद करें। आपके दर्शनों तक मेरे जीवन की रक्षा करें। द्वारिकाधीश रक्षा करे। रक्षा करें। "
सुधन्वा को खोलते तेल से भरी बड़ी कढाई में डाल दिया गया। पर घोर आश्चर्य कि सुधन्वा को कुछ भी नहीं हुआ। जैसे भक्तराज प्रहलाद की रक्षा जलती अग्नि में हुई थी, उसी तरह भक्तराज सुधन्वा भी खौलते तैल में बैठा भगवान श्री कृष्ण के नामों का उच्चारण कर रहा था।
" श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी।
हे नाथ नारायण वासुदेव.."
सुधन्वा के मुख से भगवान श्री कृष्ण की स्तुति हो रहीं थीं। चारों तरफ भक्तराज सुधन्वा की जयजयकार हो रही थी। समूचे समुदाय में बस दो ही लोग थे जो इस घटना की व्याख्या अन्य प्रकार कर रहे थे।
ज्ञान ईश्वर प्राप्ति का एक मार्ग है। ज्ञानी भगवान को बहुत प्रिय भी होते हैं। पर सच बात यह है कि जहाँ ज्ञान की सीमा समाप्त हो जाती है, वहीं से भक्ति की सीमा शुरू होती है। ज्ञानी तर्कशील होते हैं, वहीं भक्त विश्वास के धनी।
अनेकों बार चालाक लोग भोले लोगों के मानस से खेल कर अपना उद्देश्य सफल करते हैं। उस समय ज्ञानी ही अपने तर्कों से सिद्ध करते हैं कि जो दिख रहा है, वह धोखा है।
अनेकों बार जब ज्ञानी अपने ज्ञान के अहंकार में सच को भी झूठ समझने लगते हैं, उस समय भक्त सिद्ध करते हैं कि हमेशा विश्वास धोखा नहीं होता है।भक्त भगवान के नाम की अनोखी शक्ति से परिचित करा देते हैं।
अच्छा ही रहा कि दोनों गुरुओं के मन में संदेह ने जन्म लिया। अच्छा रहा कि उन्होंने अपने संदेह को प्रगट भी कर दिया। अच्छा रहा कि गुरुओं के संदेह के कारण सुधन्वा की कीर्ति युगों तक स्थायी हो गयी। जैसे स्वर्ण की चमक उसके तपाने का तथा हीरे की चमक उसे घिसने का परिणाम होती है। उसी तरह एक भक्त का यश उन सभी परीक्षाओं का परिणाम होता है जिसे वह अपने आराध्य की कृपा से ही उत्तीर्ण करता है। लगता है कि खुद भगवान अपने भक्त की परीक्षा लेकर उसके यश को इतनी ऊंचाइयों तक पहुंचा देते हैं जहाँ तक पहुंचने की चाह हर साधक के मन में रहती है।
एक तरफ चंपकपुरी के वीर भक्त सुधन्वा के जयकारे लगा रहे थे। दूसरी तरफ शंख और लिखित मुनि का चेहरा क्रोध में लाल हो रहा था। उनकी तेज आवाज के साथ सभी शांत हो गये।
" अरे ढोंगी राजा। तू संसार की आंखों में धूल झोंक सकता है। पर हमारी आंखों में नहीं। लगता है कि जब तेरा खुद का ही पुत्र समय से नहीं आया तब तूने इस खौलते तेल में औषधि मिला दी है। हमें ऐसी एक नहीं अपितु अनेकों औषधियों का ज्ञान है। जिन्हें गर्म तेल में डाल देने पर तेल खोलता तो दिखता है पर अपनी उष्णता खो देता है। वाह धूर्त राजा। खुद के पुत्र की जीवन रक्षा के लिये तुमने यह कुचक्र रच दिया। अब हम ऐसे ढोंगी राजा के राज्य में बिलकुल नहीं रहेंगे। हमारे लिये क्या नगर और क्या वन। पर जाने से पूर्व प्रजा के समक्ष इस राजा के षड्यंत्रों को जरूर खोल देगें। मूर्ख राजा। यदि वास्तव में यह तेल गर्म है तो फिर इसमें डालने पर यह नारियल भी जल जायेगा। अभी तेरा पाखंड तेरी ही प्रजा के समक्ष सिद्ध हो जायेगा। "
गुरुओं ने उस तेल से भरी कढाई में एक नारियल फेंक दिया। देखते ही देखते तेल की उष्णता से नारियल चटका और उसके दो टुकड़े उछले। एक टुकड़ा मुनि शंख के और दूसरा मुनि लिखित के सर पर लगा। नारियल के गर्म टुकड़ों के साथ गर्म तेल के छींटों ने उन दोनों के सर और चेहरे के कुछ भाग को जला दिया।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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