निर्धनता में वह पला बढ़ा फिर बजी चमका ज्यों ध्रुव तारा है,
कूद पड़ा आंदोलन में वह बूढ़ी आंखों का एकमात्र सहारा है।
गांव-गांव में घूम-घूम कर क्रांति की उलझ जगाई है,
पहिचान न सके जब अंग्रेज तो जासूसों की फौज लगाई है।
उस जलियांवाले बाग के फिर पत्ते भी खड़क उठे होंगे,
जब भारत माँ के सपूत को लोग आतंकवाद कहते होंगे।
सतरंगी हुआ आसमाँ है और धरती भी हरषाती है,
जब जलियांवाले बाग में शेखर की पिस्टल की गोली चलती है।
जिस माँ ने उसको जन्म दिया उस माँ को रोता छोड़ गया,
इंकलाब और जिंदाबाद कह फांसी के फंदे को चूम लिया।
वी स्वर्गलोक की राजसभा में इंद्रधनुषी सपने बुनता होगा,
अम्बर के असंख्य तारों में कहीं आजाद भी चमकता होगा।।
@अक्षरा

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