नादानियां इस दिल ने करनी तो बहुत चाही 
अफसोस मगर एक डोर रिश्तों की मेरी ओर चली आई 

बचपन की दुनियां में सब कुछ तो मेरा अपना था 
अब जाने क्या हुआ लकीरें हर ओर उभर आई 

रास्तों पर भी कभी तो मिल ही जाते हैं अनजाने 
क्या फर्क जो अपनों ने अपना हो कर भी दुरी बनाई 

मलाल कुछ ख़ास  नहीं ,गम फकत इतना सा है 
ऊपर वाले तेरी यह दुनियां मेरी तो समझ नहीं आई 

वो रोते होगे मेरे लिए कभी तो यादों के सहारे
एक मुझको ही तो नहीं उसकी याद हर बार आई 

नजदीकियां बढ़ाने के बहाने बहुत लगाए तुमने 
अब बढ़ गई तो क्यू कर यह तुमको जालिम रास नहीं आई।।।