बेटा सागर, बहु निशा और उनके दोनों बच्चे लगभग सोलह सालों से लंदन में रह रहे हैं। बच्चों का तो जन्म ही वहीं का है। इसबार बेटे ने हमारी शादी की सालगिरह पर हमें टिकट भेज वहीं बुलवा लिया था।
पूरी इज़्ज़त और प्यार के साथ हमारी एनिवर्सरी मनाई गई। होटल में शानदार पार्टी दी थी बेटे ने। उसके कलीग, दोस्त ,बहु और बच्चों के फ्रेंड्स सभी ने खूब जश्न मनाया।
सभी ने गले मिल विश किया।
इज़्ज़त और गिफ्ट से लाद दिया हमदोनों को।
हँसी खुशी सब सम्पन्न हुआ।
पर कुछ था जिसकी कमी मुझे विचलित कर रही थी।
टोकने जैसा तो कुछ न था लेकिन मन अपने संस्कार अपनी परंपरा अपनी रीति रिवाज को ढूंढ रहा था। कैसे करूँ कुलदेवी की पूजा। कैसे घर में पूजा हवन रखूँ। बेटा बहु पोता-पोती कोई आकर मेरे पैर छुए और मैं उसे गले लगाकर आशीर्वादों की झड़ी लगा दूँ। हर पकवानों की खुश्बू से महके खैर ......
पन्द्रह दिन रह कर हम कल वापस दिल्ली पहुंचे और मेरी ही ज़िद से इन्होंने आज की ट्रेन की टिकट करवाई और रात आठ बजे हम ट्रेन में चढ़ गए।
एक धचके के साथ गाड़ी किसी स्टेशन पर रुकी ग मेरी नींद खुली। एकदम शांत और अंधेरा था , जाहिर है आधी रात को सभी अपने बर्थ पर सो रहे थे। मैंने खिड़की से बाहर झांकने की कोशिश की। लेकिन व्यर्थ। AC डब्बे से बाहर दिखता कहाँ है। मैंने पलट कर बगल वाले बर्थ में देखा। पतिदेव भी जाग गए थे और मोबाइल पर कुछ देख रहे थे।
"कौन सा स्टेशन है " मैंने पूछा।
" धनबाद है शायद।" उन्होंने कहा।
"अच्छा धनबाद है। कितनी देर का स्टॉपेज है।"
"बीस मिनट" इन्होंने बताया
" बाप रे बाप बीस मिनट, अभी देखिए न यह बढ़ कर कितने मिनट हो जाती है। रुकी हुई ट्रेन में नींद भी तो नहीं आती।" मैने तीखे स्वर में कहा और उठने की कोशिश करने लगी।
" चुपचाप लेटी रहो नींद आ जाएगी। और अपना वॉल्यूम कम रखो घर नहीं है लोग जाग जाएंगे।"
इन्होंने फुसफुसाते हुए कहा तो मैं खुद में थोड़ा झेंप गई। और अगल- बगल के लोगों को देखने लगी। एक दो तो करवट ले रहे थे। मैं फिर पलट कर लेट गई।
सच है बहुत वर्षों बाद ट्रेन से सफर कर रही थी सो ट्रेन की सारे तौर-तरीके, शिष्टाचार भूल गईं थी।
अचानक पिछले बीस दिनों की घुटन और उद्वेगना याद आ गई। लगा सागर तो मय परिवार पिछले सोलह बरसों से लंदन में है।
मेरे सारे सवालों के जवाब मिल गए।
मधुलिका सिन्हा
कोलकाता
मौलिक लघुकथा
सर्वाधिकार सुरक्षित

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