रेत की मानिंद फ़िसलता जा रहा है वक्त ,
और साथ साथ फ़िसल रहा है मेरा वज़ूद,
पता ही नहीं कहाँ थे, कहाँ पहुँच गए हैं
ना रास्ता है,ना ही दिखते है मंजिल के निशाँ,
क्यो वक्त ने साथ ना दिया मेरा,शायद
चाहा था जिससे,उसने वक्त पर साथ ना दिया l
कहते हैं वक्त, पलट के आता जरूर है,
इसी इंतजार में है,कि लौट के आता कब है l
✍️शालिनी गुप्ता प्रेमकमल 🌸
(स्वरचित)

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