जब भी दर्द को महसूस करती हूं,
अपने दर्द को पन्नो पर उतार देती हूं,
कुछ देर के लिए दर्द कम तो हो जाता है, पर पूरी तरह जाता नही।
आंखों से बहते रहते है आंसू,
जो दर्द पन्ने पर उतारा था,
मेरा दर्द, मेरे आंसू उसका सारा बोझ,
वो पन्ना उठा लेता है,
दर्द से और आंसुओं से भीगा हुआ वो पन्ना अपनी अलग कहानी सुनाता है।
शायद कोई समझे ना समझे वो पन्ना मेरा दर्द समझता है,
मेरे आंसुओं को देखकर वो भी रो पड़ता है,
अब वो पन्ना ही मेरे दिल के करीब है
वो ही मेरा सहारा है जो,
मेरे आंसुओं,और मेरे दर्द का बोझ उठाते हुए अपना वजूद खो देता है।
हरप्रीत कौर
दिल्ली

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