आज ऋचा बहुत खुश थी। रात जैसे आँखों में ही बीत गई और क्यो न हो, सालों बाद वह अपने मायके जा रही थी। उसे तनिक भी इच्छा नहीं थी कि उसकी शादी विदेश में रहने वाले लड़के से हो लेकिन जब विशेष को पापा ने पसन्द किया और जब ऋचा ने उसे देखा तो कोई कमी न निकाल सकी।नतीजतन चट मंगनी और पट व्याह हो गया।

विशेष बस एक महीने की छुट्टी पर घर यानी कानपुर आया था।और मिस्टरऔर मिसेज़ अविनाश, विशेष के माँ-पापा उसकी शादी कर ही वापस भेजना चाहते थे। देर करने की बात ही न रह गई थी।

अगले बीस दिनों के अंदर ही ऋचा दुल्हन बन कर कानपुर आ गई।

छुट्टियाँ खत्म होते ही विशेष वापस कैनेडा चला गया और अगले दो महीनों के भीतर सारा पेपर वर्क कर उसने ऋचा को भी वहाँ बुला लिया।

ऋचा के माँ पापा या कहूँ तो खुद ऋचा के दिल से एक बहुत बड़ा बोझ उतर गया। विदेश के लड़के को लेकर जितनी शंकाए घर-परिवार वालों के मन में उठ रही थी वो सब धराशाई हो गए।

वह दिन है और आज का दिन,पूरे दस साल बीत गए उसे यहाँ आए। हर सुख-सुविधा विशेष ने उसे दी।

इस बीच दो बच्चे भी उसके घर में किलकारियाँ भरने लगे।ऋचा बहुत खुश थी। कभी तिनके भर भी अफ़सोस न करती थी। बस एक बात जो उसके मन में कांटे की तरह चुभता रहता वह यह कि इतने दिनों में वह एक बार भी अपने मायके नहीं जा सकी थी।कारण बहुतेरे थे। कभी विशेष की व्यस्तता,कभी उसकी प्रेगनेंसी तो कभी बच्चों की पढ़ाई।
हाँ इन दस सालों में माँ-पापा दोनों बच्चों के जन्म के समय उसके पर चले आए थे।और भैया भी दो  बार उससे मिलने आ चुका था।

लेकिन उसके मन मे हमेशा कचोट सी उठती। काश हर लड़की की तरह वह भी त्यौहारों में मायके जा पाती। काश उसके बच्चों का जन्म उसके मायके में होता।

वो गली-मुहल्ला उसे बहुत याद आता था। कैसे भूल सकती थी उन सखियों को जिनके संग बचपन से यौवन तक की दहलीज तय की थी। कितना हंसना कितना रोना,हर लड़ाई ,सारा प्यार उसके इर्द गिर्द घूमता रहता। इतना ही नहीं,मुहल्ले की सारी दुकानें जहाँ से कभी मीठी गोली लेकर खाती थी तो कभी कांजी वड़ा वाले रंगनाथन चाचा जो बरसों पहले तूफान में अपना घर-बार खो कर कानपुर में ही आ बसे थे।कितना प्यार करते थे वो ऋचा को।उनकी याद आते ही ऋचा के मुँह में पानी आ गया।

बस अब दो दिनों की ही बात है।फिर तो वह और उसका घर।हाँ व्याह के इतने सालों बाद भी घर कहते ही मायका ही उसके मन में घूमने लगता।क्योंकि शादी के बाद वह ससुराल में रह न सकी और विदेश तो उसे कभी अपना लगता ही न था।

वह सोचने लगी,घर की बात ही अलग है।उसे घर का एक एक कोना याद आने लगा।माँ-पापा का कमरा और उसमें रखी वो पुरानी आलमारी।बचपन से उसे वह आलमारी रहस्यमई लगती थी।कैसे माँ हर चीज़ उससे ही निकाल देती थीं।वह पलंग जिसकी हज़ारों कहनियाँ वह सुन चुकी थी।फिर उसका अपना कमरा,वहां की एक एक चीज़ उसे अपनी ओर खींच रहा था।

पुलकित मन से विचारने लगी,की उसकी किताबों की अलमारी ठीक तो होगी,वह जो अपने कपड़े छोड़ आए थी वह अभी भी उसकी अलमारी में होगी न।

अचानक मन उदास हो गया,पिछले साल जब अचानक पापा न रहे तो वह कितना रोई थी पर जा न सकी।दिल से एक आह निकली कैसा लगेगा पापा के बिना वह घर और माँ वो तो बिल्कुल चुप सी हो गई हैं।फोन पर भी कभी अच्छी तरह बातें नहीं करती है।इसीलिए तो इसबार उसने विशेष को अल्टीमेटम दे दिया था कि वह अब घर जायगी ही,और उसकी ज़िद देख विशेष भी तैयार हो गया।

और आज वो दिन आ ही गया।मन हर्ष,उल्लास से भर गया।
वह घर-शहर इतने सालों बाद कैसा लगता होगा।
क्या सबकुछ वैसा ही होगा? कैसा लगेगा इतने सालों बाद सबसे मिलना।क्या घर का हर कोना उसे वैसा ही मिलेगा जैसा वह छोड़ आईं थी?

ऋचा की उत्तेजना अपने चरम पर थी।दो दिन किसी तरह बीते और वह विशेष और बच्चों के साथ यादों में खोई खोई सी अपने शहर पहुँच गई।

एयरपोर्ट से निकलते ही भैया पर नज़र पड़ी।सबकुछ भूल वह दौड़कर उनसे गले लग गई।भैया ने भी उसे गले लगा लिया।भाई बहन दोनों की आँखे भीग गई।

विशेष ने मुस्कुरा कर दोनोंको देखा,बच्चे भी सिमटे-सिमटे से खड़े थे।पहली बार ऐसा दृश्य देख रहे थे।
खैर सबके प्यार,आशीर्वाद का सेसन खत्म हुआ और सब घर की ओर निकल पड़े।

पर यह क्या जैसे-जैसे ऋचा घर की ओर जा रही थी,विषमय में घिरती जा रही थी।शहर बिल्कुल बदला से लग रहा था।ऊँची-ऊँची इमास्तें,अपना रंग दिख रही थी।शहर का बीयूटीफिकेशन हो गया था। होटल,मॉल सभी नज़र आ रहे थे।पर उसका अपना शहर कहीं खो से गया था।भैया बड़े जोश में इस बदलाव का जिक्र कर रहे थे पर ऋचा तो अपने पुराने शहर को ढूंढ रही थी।देखते-देखते वो अपनी गली में आ गई।वह खिड़की से बाहर देखने लगी अरे कहाँ गई वह छोटी बड़ी दुकाने और कहाँ खो गई वह कांजी वड़े की खुशबू।
गली का मंदिर भी खाली से लगा।
ऋचा का मन व्यथित हो गया।क्या ये उसका शहर है? जहाँ घर से निकलते ही सभी उसे पहचान लेते थे।कोई चाचा,कोई भैया,कोई भाभी,दीदी मिल जाती थी और घण्टों बातें होती थी।पर आज इतने सालों बाद वह आई है पर कोई हलचल नहीं जैसे वह सबके लिए अजनबी है।

खैर इसी उधेड़बुन में वह घर पहुँच गई। माँ को देखते ही उनसे लिपट  कर खूब रोई।मन की अकुलाहट जैसे आंसू बन निकल रहा था।

घर भी अब वैसा न रह। सबकुछ तो बदल गया।फर्नीचर पुराने हो गए कह कर सबकुछ बदल  गया था। कहाँ उसकी किताबें,उसके कपड़े,उसके बचपन से सहेजे खिलौने सब जैसे किसी बक्से में बंद हो गए थे।घर का कोना-कोना नई और कीमती चीज़ों से भर गया था पर वह जिस घर की ललक को लिए इतनी दूर से आई थी वह घर तो अब था ही नही घर की वो चिरपरिचित खुशबू किसी रूम फ्रेशनर की खुशबू के नीचे दब सी गई थी।

वह कई दिनों तक घर के कोने कोने में वे ढूंढती रही। पर वह खुद को कही न देख पा रही थी।वो घर वो आँगन जैसे उसे बिल्कुल नया सा लग रहा था।
भावनाएँ बांध तोड़ बहने को उतावली हुई जा रही थी।कहाँ ढूँढे वह अपने उन बीते हुए दिनों को।उसे उदास देख सभी चिंतित हो गए।माँ, भाई भाभी यहाँ तक कि विशेष और बच्चे भी उसकी उदासी को समझ न पा रहे थे।और वह भी किसी को कुछ बताने की स्थिति में नही थी।

लगभग सप्ताह ही बीता होगा कि ऋचा का मन वहाँ से उचट गया। क्या सोच कर आई थी और क्या पाया।

कई बार घर से बाहर निकली। पड़ोसियों के घर गई,लोगों से मुलाकातें भी हुई पर औपचारिकता ही लगी।सबने बस यही सोचा कि कैनेडा से आई है तो बस आवभगत की जाए।
अदब से बातें होती।लंच-डिनर होने लगे।पर इसमें वो स्वाद  कहां जो कभी खुद रसोई में भाभियों संग गप्पे मारते हुए मठरियाँ खाने में था।किसी ने साथ पिक्चर जाने को न कहा।
बस विदेशी खोल में ऋचा की आत्मा जैसे कैद हो गई थी।

सच ये कैसी विडंबना है।जहाँ जीवन बिताना है वह अपना सा नही लगता और जिसे अपना समझती रही वो अनजाना सा हो गया,या उस घर शहर ने उसे अजनबी बना दिया।

जहाँ अपने बचपन,अपने किशोरावस्था के निशान ढूंढने आई थी वह इस नए चकाचौंध में कहीं खो सा गया।

सब कुछ खोकर,खाली मन  लिए अब वह वापस जाने को तैयार हो गई।
मधुलिका सिन्हा
कोलकाता
मौलिक  और सर्वाधिकार सुरक्षित