प्रधानमन्त्री कार्यालय की लॉबी के एक कोने में बैठे दो लोग आपस में कुछ बातें कर रहे थे, उनकी बातें भारत की साइबर सुरक्षा पर केंद्रित थीं। इन दिनों भारत के कुछ महत्वपूर्ण कंप्यूटर नेटवर्क्स पर साइबर हमले काफी बढ़ गए थे इन्हें रोका कैसे जाए इसी बारे में दोनों जन अनौपचारिक वार्तालाप कर रहे थे; तभी उनमें से एक व्यक्ति के फ़ोन की घंटी बजी; फ़ोन पर दूसरी ओर की बातें सुनने के बाद उसने उत्तर दिया, "ठीक है पैसे भेज दो, पर ये कहाँ खर्च हो रहे हैं उस पर दृष्टि बनाए रखना।" उसके बाद उसने फोन रख दिया और अपने साथी से फिर से बातें करने लगे। थोड़ी ही देर बाद वहाँ प्रधानमंत्री जी आ गए उनके आते ही इन दोनों खड़े होकर उनका अभिवादन किया।
"श्रीमान् बसु आप रॉ प्रमुख बनने के बाद पहली ही भेंट में मुझे कोई अशुभ समाचार सुनाने वाले हैं", प्रधानमंत्री जी ने उन दोनों में से एक को उलाहना देने के अंदाज में कहा।
"जहाँ से हमें समाचार मिलते हैं वह स्रोत ही अशुभ है तो हम क्या करें", श्रीमान् बसु ने प्रधानमंत्री की बात का उत्तर देने के बाद अपने साथ आए व्यक्ति का परिचय करवाया, "सर; इनसे मिलिए ये हैं श्रीमान् 'देवराज' इंटेलिजेंस एजेंसी ईआईए के निदेशक, इनके पास राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा कोई महत्वपूर्ण इनपुट है, जिससे हमें अवगत कराने ये यहाँ आए हैं।"
"तो फिर चलिए अंदर बैठकर बातें करते हैं", प्रधानमंत्री के साथ दोनों जासूस सिचुएशन रूम में चले गए यहाँ पहले से ही राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार; चीफ ऑफ़ डिफेन्स स्टाफ; रक्षा मंत्री; NACWC के चेयरमैन जैसे महत्वपूर्ण लोग बैठे हुए थे।
प्रधानमंत्री के पूछने पर कि ईआईए क्या है देवराज ने संक्षेप में अपनी इस संस्था के बारे में बताया, "ईआईए यानि कि एस्पियोनाज एंड इंटेलिजेंस एजेंसी एक स्वतंत्र गुप्तचर संस्था है, इसकी स्थापना आठ वर्ष पूर्व देश को सुरक्षित रखने में अपना योगदान करने की इच्छा रखने वाले कुछ लोगों ने की थी, वे २६/११ की घटना से व्यथित थे। ऐसा आतंकवादी हमला दोबारा न हो इसके लिए उन्होंने नौकरशाही और सरकारी नियंत्रण से मुक्त इंटेलीजेंस एजेंसी की स्थापना की......
…………उनके नाम तो स्वयं मैं नहीं जानता आपको क्या बताऊँगा और मैं हूँ देवराज; ईआईए का निदेशक, देवराज यह मेरा वास्तविक नाम नहीं है, यह एक कोडनेम है जो हर निदेशक को दिया जाता है अब तक मुझसे पहले दो एजेंट्स इस पदवी को धारण कर चुके हैं ……….
इसके बाद देवराज ने अपनी एजेंसी के काम के बारे बताना शुरू किया, "अपनी उपलब्धियों के बारे में बताऊँ तो हमने अब तक नौ खूँखार आतंकवादियों को नेपाल, बांग्लादेश और मलेशिया से पकड़ा है और तीन बार आतंकवादियों की योजना विफल की है। रॉ के साथ हमारा सम्पर्क दो वर्ष पूर्व एक अभियान के दौरान हुआ था तब से हम साथ में काम कर रहे हैं।"
प्रधानमंत्री जी उसकी बातों से संतुष्ट नहीं हुए थे उन्हें ईआईए और उसके कामकाज के बारे में और जानना था पर उसके लिए यह समय उचित नहीं था तो उन्होंने मन मारकर कहा, "ठीक है...... अभी मैं इतनी जानकारी से संतोष कर लेता हूँ ; अब वह बात बताइए जिसके लिए हम जमा हुए हैं।"
देवराज ने पीएमओ के प्राइवेट कंप्यूटर नेटवर्क से जुड़े अपने लैपटॉप में से एक फाइल निकाली जिसमें पाकिस्तान और अफगानिस्तान से एकत्र किए गए इंटेल से कुछ प्रमुख बातें वह एक बड़े मॉनिटर पर सबके सामने रखने लगा, "हमारे पास पक्की जानकारी है कि आईएसआई यूनाइटेड जिहाद कॉउन्सिल के साथ मिलकर भारत पर रासायनिक हमला करने वाले हैं जिसका कोडनेम उन्होंने रखा है ऑपेरशन गाज़ी। यह हमला कब और कहाँ होगा यह तो हमें नहीं पता पर इसके लिए आतंकवादियों को प्रशिक्षण कहाँ दिया जा रहा है तथा उन्होंने रासायनिक हथियार कहाँ रखे हैं यह हम जानते हैं……
अपनी बात कहते हुए देवराज ने स्क्रीन पर आतंकवादियों के कैंप का एक एरियल चित्र प्रस्तुत किया और फिर वह उसके बारे में बताने लगा, "स्क्रीन पर आप जो देख रहे हैं वह आतंकवादियों का नया प्रशिक्षण केंद्र है आज से पहले इसके बारे में कोई भी जानकारी हमारे पास नहीं थी। इंटेल है कि यहाँ २५० से अधिक आतंकवादी उपस्थित हैं। इस ऑपरेशन की सारी तैयारी नूर मोहम्मद के नेतृत्व में हो रही है वह भी इस समय कैंप में मौजूद है। यह अच्छा अवसर है हम रासायनिक हथियार और नूर दोनों को ही मार सकते हैं एक ही ऑपरेशन में; बस आप सबकी स्वीकृति चाहिए।"
देवराज की रिपोर्ट देखने के बाद सीडीएस ने उससे पूछा, "उनके पास कितने और किस प्रकार के रासायनिक हथियार हैं?"
देवराज ने बताया, "उनके पास आर्टिलरी शेल्स के रूप में ३०० रासायनिक हथियार हैं, इनमें अत्यंत घातक सल्फर-मस्टर्ड गैस का उपयोग किया गया है। हमारे पास पुष्ट सूचना है कि आईएस ने इन्हीं हथियारों के stockpile में से कैम्प विक्ट्री पर रासायनिक हमला किया था।"
सारी बात सुनने के बाद प्रधानमंत्री जी ने बैठक में उपस्थित विशेषज्ञों से पूछा, "तो हमारे पास इन हथियारों को नष्ट करने के क्या उपाय हैं?"
वायुसेनाध्यक्ष को लगता था कि लड़ाकू विमान से मिसाइल या बम गिराकर हथियारों को नष्ट किया जा सकता है तो उन्होंने वायुसेना की क्षमता बताते हुए कहा,"सर हम हमारे राफेल विमानों से बम गिरा कर हथियारों के साथ-साथ कैंप को भी नष्ट कर सकते हैं, कुछ ही घंटे लगेंगे तैयारी करने में और स्ट्राइक करके कल सुबह तक विमान सकुशल वापस भी आ सकते हैं।"
इस बैठक में रासायनिक हथियारों को निष्क्रिय करने का काम करने वाली भारतीय एजेंसी नेशनल केमिकल वेपन कन्वेंशन के चेयरमैन और एक उनके साथ आया एक विशेषज्ञ भी बैठे थे वे दोनों ही कैंप पर एयर स्ट्राइक करने से सहमत नहीं थे उन्होंने इसका कारण बताया, " हम बात कर रहे हैं रासायनिक हथियारों की, मिसाइल से कैम्प तो नष्ट हो जाएगा पर ये हथियार नहीं और यदि गैस लीक हो गई तो हजारों लोग मरेंगे जिसका आरोप हम पर आएगा अतः मेरे विचार से हमें एयर स्ट्राइक के बजाय दूसरे उपायों पर ध्यान देना चाहिए।"
प्रधानमंत्री ने उसकी बात को सही माना और बाकी लोगों से कहा, "यह बात भी सही है, तो अब हमारे पास एक ही उपाय है, हमें कैम्प पर सर्जिकल स्ट्राइक जैसा कुछ करना होगा। आप सबकी क्या राय है?
थलसेनाध्यक्ष ने कहा, "जी हाँ सर आपकी बात सही है रासायनिक हथियारों को नष्ट करने लिए हमें कैंप पर स्ट्राइक ही करना होगा।"
"सेना कब तक तैयार हो जाएगी?" प्रधानमंत्री ने पूछा।
तो थलसेनाध्यक्ष ने उत्तर दिया, "हमारे पास टारगेट बिल्डिंग की पूरी जानकारी है तो मुझे लगता है कि स्ट्राइक की तैयारी और अभ्यास के लिए ३६ घंटे पर्याप्त होंगे।"
बैठक में आए सभी लोग सर्जिकल स्ट्राइक करने के लिए सहमत हो गए थे फिर भी उनकी बैठक कुछ घंटे और चली। स्ट्राइक के बाद विश्व की ओर से और देश के अंदर से भी कैसी प्रतिक्रियाएँ आएँगी, उनसे निपटना कैसे है इस सबके बारे में गहन मंत्रणा करने के बाद प्रधानमंत्री ने सर्जिकल स्ट्राइक के लिए अनुमति दे दी।
सरकार की ओर से ग्रीन सिग्नल मिलते ही स्ट्राइक की तैयारियाँ शुरू हो गई, सबसे पहला काम था उन सैनिकों का चुनाव करना जो इस कठिन ऑपरेशन को अंजाम दे सकें। इसके लिए थल सेना स्पेशल ऑप्स यूनिट पैराशूट रेजिमेंट के सैनिकों से श्रेष्ठ और कौन हो सकता था; आखिर वे इसी के लिए ही तो बने थे। चूँकि ऑपरेशन के लिए सैनिकों को कार्गो विमान से हेलो जम्प (HALO JUMP) अर्थात विमान से पैराशूट पहनकर कूदना था अतः इसके लिए रेजिमेंट की छठी बटालियन को चुना गया जिन्हें एयरबोर्न ऑपरेशन करने के लिए ही विशेष रूप से प्रशिक्षित किया गया था।
इन जवानों को कैंप तक ले जाने के लिए वायुसेना के सी-१७ ग्लोबमास्टर विमान को तैयार किया जाने लगा, रडार की तरंगों को छितराने के लिए विमान के सामने के भाग को नुकीला बनाया जाने लगा ताकि तरंगे इससे टकराकर तितरबितर हो जाएँ तथा रडार के रिसीवर्स तक वापस न जा सकें, परन्तु सी-१७ जैसे बड़े विमान को छिपाने के लिए इतना पर्याप्त नहीं था रडार अभी भी उसे डिटेक्ट कर सकता था।
दूसरा काम था आक्रमण किस प्रकार होगा इसकी योजना बनाना, ईआईए के एजेंट जुपिटर और छठी बटालियन के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल सी के नायडू मिलकर एक ऐसी योजना बना रहे थे जिसका प्रयोग करके शत्रु को चौंकाया जा सके; उन्हें संभलने का लेशमात्र भी अवसर न मिले।
एलिमेंट ऑफ़ सरप्राइज़ इस प्रकार के हमलों का एक प्रमुख अंग होता है, जिस पर हमला हुआ है उसे प्रतिक्रिया देने में जितना समय लगता है उतने में हमलावरों का आधा काम हो चुका होता है। महाराणा प्रताप के नेतृत्व में राजपूतों ने, छत्रपति शिवाजी के नेतृत्व में मावळे वीरों ने इसी रणनीति का उपयोग करके अपने से कई गुना बड़ी मुगलों की सेनाओं को हराया था। पीओके में की गई सर्जिकल स्ट्राइक्स में भी एलिमेंट ऑफ़ सरप्राइज़ का भरपूर प्रयोग किया गया था, जैसे उस समय एलओसी के आसपास रहने वाले आतंकवादी सरप्राइज़ हो गए थे वैसे ही शांगला कैंप में रह रहे जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादियों ने भी यह कभी सोचा नहीं होगा कि भारत के सुरक्षा बल अंतरराष्ट्रीय सीमा पार करके पाकिस्तान में इतने अंदर तक घुस कर उन्हें मारने के लिए आएँगे, उन्हें लगता था कि यहाँ वे सुरक्षित हैं।
तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण काम था पाकिस्तानी एयर डिफेन्स और अवाक्स (एयरबोर्न वार्निंग एंड कण्ट्रोल सिस्टम) को चकमा देने के उपाय खोजना। बालाकोट में हुई एयर स्ट्राइक के बाद से पाकिस्तान ने किसी भी हवाई हमले की चेतावनी देने के लिए पाँच अवाक्स लगे हवाई जहाज ख़रीदे थे जो हर समय उड़ते रहते थे, शांगला के कैंप तक सकुशल जाने के लिए इनसे बचना बहुत ही आवश्यक था। पिछली बार जब भारतीय विमानों ने सीमा पार की थी तो उन्हें रडार्स द्वारा पहचाने जाने से बचाने के लिए हैकरों के एक समूह ने नेटवर्क को हैक करके फाल्स सिग्नल्स भेजकर रडार्स को जाम कर दिया था पर सुरक्षा बलों ने इस बार कुछ अलग करने का सोचा था ताकि पाकिस्तानियों को तनिक भी संदेह न हो।
एजेंट कासिम नौशाद और दाऊद एक पहाड़ी पर अपने साजो सामान के साथ पाकिस्तानी एयर डिफेन्स को भ्रमित करने की अपनी योजना का परीक्षण करने आए थे। उन लोगों ने ईआईए के आर&डी विभाग से मिले तीन ड्रोन्स को पहले असेम्बल किया फिर उन्हें उड़ने के लिए छोड़ दिया।
जब ड्रोन्स ने एक निश्चित ऊँचाई प्राप्त कर ली तब तीनों एजेंट्स ने अपने-अपने कंट्रोलर पर एक बटन दबा दिया, इससे हुआ यह कि ड्रोन्स में लगे संचार उपकरणों से रेडियो तरंगे निकलने लगीं। जब रडार से निकली हुई रेडियो तरंग किसी विमान से टकराकर रडार के रिसीवर तक वापस आती हैं तो सिस्टम को पता चल जाता है कि वह विमान अपना है या शत्रु का, उसका आकार क्या है, उसकी गति कितनी है और वह हमसे कितनी दुरी पर है इत्यादि।
ड्रोन्स से निकल रही रेडियो तरंगे बिलकुल वैसी ही थीं जिनका उपयोग पाकिस्तानी एयर डिफेन्स सिस्टम करते थे, इसीलिए जब रिसीवर्स को यह तरंगे मिलीं तो सिस्टम ने समझा कि शत्रु के लड़ाकू विमान उनके एयर स्पेस में घुस आए हैं।
इस घुसपैठ का उत्तर देने के लिए तुरंत ही सरगोधा एयरबेस से पाँच एफ-१६ लड़ाकू विमान जहाँ शत्रु के विमान डिटेक्ट हुए थे उस दिशा में उड़ गए। एफ-१६ का यह समूह उस जगह से थोड़ी ही दूर था जहाँ से उनके रडार शत्रु विमानों को डिटेक्ट कर सकते थे तब एक फ्लाइट लेफ्टिनेंट को कुछ गड़बड़ लगी उसने अपने स्क्वॉड्रन लीडर से कहा, "वाईपर-१ मेरे जेट के रडार में दुश्मन के फाइटर जेट दिखाई नहीं दे रहे..... क्या आपको दिख रहे हैं?"
नेगेटिव वाईपर-३ मेरे जेट के AESA रडार में भी दुश्मन का कोई फाइटर जेट नहीं दिख रहा…. मुझे लगता है वहाँ कोई जेट है ही नहीं वापस चलो।
कोई फाइटर जेट होता तो दिखाई देता न और वे तीनों ड्रोन्स बी एफ-१६ के आने से पहले ही सिग्नल्स छोड़ना बंद करके नीचे आकर कहीं छिप गए थे इसीलिए वे पाकिस्तानी पायलट्स को दिखाई नहीं दिए। एयर डिफेन्स सिस्टम की मॉनिटरिंग करने वाले लोग भी आश्चर्यचकित थे कि एक तो शत्रु के विमान अचानक ही डिटेक्ट हुए उसके बाद बिना कोई चिह्न छोड़े गायब भी हो गए काम से कम जब एफ-१६ उन्हें इंटरसेप्ट करने गए थे उस समय तो जेट्स दिखने चाहिए थे न। इससे उन लोगों ने यही समझा कि उनका सिस्टम आज ठीक से काम नहीं कर रहा है।
जमीन पर खड़े तीनों एजेंट्स ऊपर नजर रखे हुए थे उन्होंने देखा कि किस प्रकार पाँच लड़ाकू विमान आए और बिना कुछ किए वापस भी लौट गए मतलब उनका परीक्षण सफल रहा, अब भारतीय विमान सरलता से पाकिस्तानी एयर स्पेस में घुस सकते थे।
चीन के चाणक्य कहे जाने वाले मिलिट्री टैक्टिक्स के विशेषज्ञ "सन त्ज़ू" ने "सन त्ज़ू बिंगफा"नामक पुस्तक लिखी थी अंग्रेजी में जिसे "द आर्ट ऑफ़ वॉर" कहते हैं। अपनी इस पुस्तक में वे लिखते हैं, "यदि तुम अपने शत्रु को भली भाँति जानते हो और स्वयं की क्षमताओं को पहचानते हो तो विजयश्री तुम्हारे पग चूमेगी।"
आज दो हजार वर्ष बाद भी उनकी कही बातें उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी वे अपने समय में थीं। सर्जिकल स्ट्राइक जैसे अभियानों के लिए शत्रु के ठिकानों की पूरी जानकारी होने से घातक तथा सटीक हमला करने में सहायता मिलती है और यह जानकारी एकत्र करने का काम करते हैं जासूस, आज जब टेक्नोलॉजी इतनी विकसित हो गई है तो जासूसों को भी थोड़ी सहूलियत मिल गई है, सर्विलांस ड्रोन्स के माध्यम से वे किसी गुप्त स्थान पर बैठकर कहीं भी निगरानी का काम कर सकते हैं शांगला के कैंप के ऊपर भी एक ऐसा ही ड्रोन मंडरा रहा था जो यहाँ होने वाली हर गतिविधि की रियल टाइम तस्वीरें अपने हैंडलर्स तक पहुँचा रहा था। तो उसने क्या देखा ?
कैंप ५ एकड़ के क्षेत्रफल में फैला था जिसे सुरक्षा देती थी कंक्रीट की २ फुट मोटी और १५ फुट ऊँची एक दीवार, इस दीवार से घुसपैठियों को दूर रखने के लिए रेजर की धार वाली स्टील ब्लेड्स लगी बाड़ लगाई गई थी।
परिसर में कई प्रकार भवन बने थे जैसे-कि आवासीय कक्ष जहाँ प्रशिक्षु आतंकवादी रहते थे, इसके ठीक बगल में शस्त्रागार बना था, बड़े ओहदे के आतंकियों के लिए एक अलग से भवन बनाया गया था जिसे बंकर कहना अधिक उचित होगा क्योंकि इसकी दीवारें कॉन्क्रीट की मोटी परत से बनी थी और छत की मजबूती पर विशेष ध्यान दिया गया था सुरक्षाकर्मियों की संख्या भी अधिक थी यहाँ, मजहबी शिक्षा देने के लिए मदरसा था, बिजली की आपूर्ति के लिए एक अलग कक्ष में डीज़ल से चलने वाले दो जेनेरेटर रखे हुए थे, कैंप की सुरक्षा करने वालों के रहने के लिए एक अलग से भवन बना था; थर्मल सेंसर्स से पता चला कि इसके अंदर हर समय ५० सुरक्षाकर्मी होते ही थे। निशानेबाजी के अभ्यास के लिए शूटिंग रेंज बने हुए थे, एक स्विमिंग पूल था तैराकी के अभ्यास के लिए, खेल के मैदान थे मनोरंजन के लिए। कुल मिलाकर यह एक मिलिट्री कैंप जैसा ही था बस यहाँ सैनिकों के स्थान पर आतंकवादी तैयार होते थे।
कैंप के अंदर जाने और बाहर आने का केवल एक ही रास्ता बनाया गया था और उस पर मेटल डिटेक्टर्स; बॉडी स्कैनर्स लगे थे, उसके आसपास एके राइफल्स और लाइट मशीन गनों से लैस २० आतंकवादी हमेशा खड़े रहते थे, ये लोग बिना अनुमति के किसी को भी अंदर घुसने नहीं देते थे। इन व्यवस्थाओं को पार करके कैंप में घुसना कठिन तो था पर असंभव नहीं। कैंप के चित्रों का बारीकी से निरीक्षण करने पर एजेंट्स को ऐसे स्थान मिल ही गए जहाँ से घुसपैठ करना संभव हो सकता था।
योजना तो बन गई अब बस अभ्यास करना ही शेष रह गया था। अभ्यास करने के पहले सभी १०० कमांडोज़ को २०-२० के पाँच समूह अल्फ़ा ब्रावो चार्ली डेल्टा और एको में बाँट दिया गया कैंप पर कौन-सा समूह कहाँ से घुसेगा और उसका लक्ष्य क्या होगा कर्नल सी के नायडू सबको बताने लगे। समय कम था इसीलिए अभ्यास करने के पारंपरिक तरीकों के स्थान पर टेक्नोलॉजी का प्रयोग किया गया। पुरे कैंप का वर्चुअल रियलिटी युक्त कंप्यूटर सिम्युलेशन बनाया गया जिसमें अभ्यास करके सभी कमांडोज़ ने अपना-अपना काम दिमाग में अच्छी तरह से बैठाने लगे।
स्ट्राइक का दिन आ गया तय समय पर पैरा ट्रूपर्स को लेकर भारतीय वायुसेना का विमान सी-१७ खैबर-पख्तूनख्वा के लिए उड़ चला, उसके कुछ मिनट बाद ईआईए एजेंट्स ने मध्यम आकार के सैंकड़ों छोटे-छोटे ड्रोन्स आकाश में विचरने के लिए छोड़ दिए।
इन ड्रोन्स से निकल रहे रेडियो सिग्नल्स जब अवाक्स और एयर डिफेन्स रडार्स तक पहुँचे तो मॉनिटरिंग स्क्रीन पर कई सारे बिंदु दिखने लगे, ऐसा लगता था जैसे लड़ाकू विमानों की पूरी सेना ने आक्रमण कर दिया हो। चूँकि एक दिन पहले भी सिस्टम को ऐसे ही सिग्नल्स मिले थे जबकि कोई घुसपैठ हुई नहीं थी तो आज भी पाकिस्तानियों ने मान लिया कि सिस्टम में कोई तकनीकी गड़बड़ी है वे इसे ठीक करने में लग गए, न तो उन्होंने फाइटर जेट्स भेजे और न ही कोई एयर टू सरफेस मिसाइल छोड़ी गई, जबकि उन सैकड़ों बिंदुओं में से एक छोटा-सा बिंदु सी-१७ का भी था उसके पायलट बिना किसी चिंता के विमान को पाकिस्तानी एयर स्पेस में उड़ाते रहे।
जब वे शांगला के निकट पहुँचे तब पायलट ने कमांडोज़ को सूचित किया, "दो मिनट में उतरने की जगह पर पहुँचेंगे तैयार रहो।"
"रॉजर दैट"........ उसके संदेश के बाद कर्नल नायडू ने अपने जवानों से कहा, "मेरे जवानों २ मिनट में हम उतरेंगे........ हेलमेट पहन लो; अपने इक्विपमेंट्स की जाँच करके यह देख लो कि सब कुछ ठीक से काम कर रहा है या नहीं।"
अंतिम समय की सारी तैयारियाँ हो जाने पर सभी कमांडो पंक्ति बनाकर खड़े हो गए और कार्गो सेक्शन का दरवाजा खुलने की प्रतीक्षा करने लगे। १ मिनट बीत जाने के बाद दरवाजा खुल गया पर कोई कूदा नहीं, लाल बत्ती अभी भी जल रही थी यानि कि विमान अभी उस जगह पहुँचा नहीं था जहाँ से उन्हें कूदना था। कुछ ही समय बाद बत्ती हरे रंग का प्रकाश छोड़ने लगी, यह संकेत था उनके उतरने का। कमांडिंग ऑफिसर कर्नल नायडू ने अपने सभी सैनिकों को आदेश दिया,
कूदो ........ कूदो ......... कूदो
दो-दो की जोड़ी बनाकर सभी कमांडोज़ विमान से कूद गए, हवा का प्रतिरोध झेलते हुए सब के सब अपने लैंडिंग जोन की ओर तेजी से गिरने लगे। कमांडोज़ सही जगह पर उतरें इसके लिए उन सबको दिशा दिखाने का काम भारतीय पोज़िशनिंग सिस्टम नाविक (नेविगेशन विद इंडियन कॉन्स्टलेशन) कर रहा था, जो हेलमेट उन्होंने पहन रखे थे उसमें ऑगमेंटेड रियलिटी की तकनीक का उपयोग करके लैंडिंग के निर्देशांक प्रदर्शित हो रहे थे। जब वे एक निश्चित ऊँचाई पर पहुँच गए तो उन्होंने अपने पैराशूट खोल लिए।
ऊपर हवा में कमांडोज़ गोते लगा रहे थे तो यहाँ नीचे धरती पर ईआईए के एजेंट्स उनकी लैंडिंग को सुरक्षित बनाने का जतन कर रहे थे, जिसके लिए उन लोगों ने कैंप की ओर आने वाले हर रास्ते को ब्लॉक कर दिया था और पुरे क्षेत्र की दूर संचार व्यवस्था उन्होंने ठप कर दी थी ताकि जब धूम धड़ाका शुरू हो तो उसका शोर सुनकर टेलीफोन अथवा रेडियो के
रात के एक बजे कमांडोज़ ने कैंप से लगभग २ किमी दूर लैंड किया, अपने उतरने के सभी चिह्न मिटाते हुए वे ५०० मीटर दूर दक्षिण-पश्चिम में जाने लगे। उस जगह पर ईआईए के एजेंट्स अपने कुछ खिलौनों के साथ उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। बीस मिनट तक पहाड़ी पर पैदल चढ़ाई करने के बाद कमांडोज़ कर्नल का संकेत पाकर रुक गए, कर्नल नायडू ने अपनी फ़्लैश लाइट से सामने की और मोर्स कोड में कुछ संकेत भेजे, इसके उत्तर में सामने से भी सफेद प्रकाश बार-बार जलता बुझता दिखा जिसे देखने के बाद कर्नल ने अपने जवानों से कहा, "आराम से मेरे लड़कों हम मुलाकात की जगह पर पहुँच गए हैं।"
"शांगला में स्वागत है कर्नल, मैं हूँ एजेंट सूर्यदेव ये है एजेंट सोमदेव और ये एजेंट वरुणदेव ", सामने से आए ईआईए के एजेंट ने अपना और अपने साथियों का परिचय करवाते हुए कहा। ये तीनों कमांडोज़ को उनके ऑपरेशन में सहायता करने आए थे।
"एजेंट सूर्यदेव, देवराज, जुपिटर, क्या तुम्हारी एजेंसी में सभी सीक्रेट एजेंट्स के कोडनेम देवी-देवताओं के नाम पर रखे जाते हैं?"
"नहीं हम दूसरे नाम भी रखते हैं जैसे-कि विश्वरूप; शौर्य, ऐसे नाम सुनने में अच्छे लगते हैं, क्यों हैं न?" एजेंट सूर्य ने उत्तर दिया।
"हाँ वह भी है, तो हमारे लिए क्या है तुम्हारे पास?"
"आपके ऑपरेशन में काम आए ऐसी चीजें हम आपके लिए लाए हैं", एजेंट सूर्यदेव ने कहा फिर अपने एक बड़े से सूटकेस से दो बोतलें निकाली और कहा, "इनमें भरा विलयन कैंप के बाहर लगी बाड़ काटने में आपकी सहायता करेगा, लीजिए।"
फिर उसने दो सिलेंडर कमांडोज़ को देकर कहा, "दीवार तोड़ने के लिए बम नहीं इस सिलेंडर में भरी चीज का उपयोग कीजिएगा।"
"और भी कुछ है या बस इतना ही?"
"और है न", सूर्यदेव ने उन्हें एक छोटे टैंक जैसा वाहन दिखाते हुए कहा, "यह देखिए यह है अनमैन्ड ग्राउंड वेहिकल; इस प्रकार के दो ड्रोन आपके ग्राउंड सपोर्ट के लिए साथ जाएँगे और एयर सपोर्ट के लिए हमारा एक कॉम्बैट ड्रोन उड़ रहा है।"
कमांडोज़ ने सारा सामान अपने बैग में भर लिया और कैंप की ओर चले गए।
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अल्फा और चार्ली को नूर मोहम्मद को पकड़ने का काम मिला था उन लोगों ने अपने टारगेट बिल्डिंग को बी-१ का नाम दिया था, कैंप की बाहरी दीवार के अंदर वह बिल्डिंग बनी हुई थी वहाँ तक जाने के लिए सबसे पहले स्टील की बाड़ को रास्ते से हटाना आवश्यक था।
एक कमांडो ने अपने बैग से बोतल निकाली और उसमें भरे विलयन को उसने बाड़ पर छिड़क दिया, कुछ सेकंड हुए होंगे इतने में ही विलयन के प्रभाव से स्टील मोम के समान पिघल गया।
अब उनके सामने रुकावट के रूप में केवल कॉन्क्रीट की दीवार थी, सामान्यतः ऐसे में दीवार में छेद बनाने के सैनिक लोग विस्फोटकों का प्रयोग करते हैं पर यहाँ तो उन्हें चुपचाप अंदर घुसना था इसीलिए ईआईए ने उन्हें एक रसायन दिया था, कमांडो ने दीवार पर क्रीम जैसा वह रसायन छिड़क दिया, इसने दीवार को इतना कमजोर कर दिया कि जब पहला कमांडो दीवार तोड़ कर अंदर घुसा तब ऐसा लगा जैसे उसने रेत के बने महल को तोड़ा है।
कमांडोज़ का दूसरा समूह टीम डेल्टा एको और ब्रावो जनरेटर कक्ष के पास से अंदर घुसे; केवल पाँच लोग थे यहाँ, जनरेटर चलाने और बिजली के कंट्रोल पैनल की देखरेख की जिम्मेदारी इन्हीं के ऊपर थी, डेल्टा टीम ने इन सबको मार दिया और शवों को छिपा दिया।
उसके बाद ब्रावो टीम के एक कमांडो ने कंट्रोल पैनल से छेड़छाड़ करके बिजली की आपूर्ति बाधित कर दी, जिससे शस्त्रागार और बी-१ के आसपास जितने भी जितने भी बल्ब जल रहे थे सब एक साथ बुझ गए, घनघोर अंधेरा छा गया; कोवर्ट ऑपेरशन को सफलतापूर्वक संपन्न कराने के लिए और क्या चाहिए।
अंधेरे में छिप कर कमांडोज़ शस्त्रागार की ओर चले गए, उनको कवर देने के लिए ऊँची जगहों पर टीम के स्नाइपर्स छिप गए। आवासीय भवन की ओर से कोई खतरा इस ओर न आए इसके लिए एको टीम के पाँच कमांडोज़ भवन के आसपास जगह-जगह कुछ प्रॉक्सिमिटी सेंसर से युक्त लैंड माइंस और प्लास्टिक एक्सप्लोसिव लगाने लगे इस दौरान उन्होंने ध्यान रखा कि कोई उन्हें देख न ले।
शस्त्रागार वाले भवन के मुख्य द्वार पर सुरक्षा के लिए बारह आतंकवादी तैनात किए गए थे, पर उन्हें देखकर लगता नहीं था कि वे पहरेदारी कर रहे हैं द्वार से कुछ दूर खड़े वे आपस में बतिया रहे थे उन्हें इस बात का जरा भी आभास नहीं था कि उनके शत्रु उनके घर में घुस चुके हैं।
सभी आतंकवादी कमांडोज़ के निशाने पर थे टीम लीडर के संकेत पर सबकी साइलेंसर लगी राइफल्स से गोलियाँ निकली और किसी के सिर को; किसी के गले को; तो किसी के हृदय को भेदती चली गईं, थोड़े ही सेकंड के अंतराल के बाद सभी पहरेदारों के निर्जीव शरीर अब धूल चाट रहे थे।
उन्हें मरा हुआ मान कमांडोज़ अपना कवर छोड़कर बाहर निकले तथा शस्त्रागार की ओर जाने लगे। जब वे भवन के पास पहुँचे तब जिन्हें वे मृत समझ रहे थे उनमें से जीवित बचे दो आतंकवादियों ने उन्हें देख लिया अपनी राइफल उठाकर वे कमांडोज़ को मारने ही वाले थे, लेकिन तब तक स्नाइपरों की दृष्टि उन पर पड़ चुकी थी, उन्होंने इन आतंकवादियों की मंशा पूरी नहीं होने दी; बस दो गोलियाँ चलीं और ये दोनों आतंकवादी जन्नत को रवाना हो गए। इस बार जमीन पर रक्त के साथ-साथ उनका ब्रेनवॉश किया हुआ दिमाग भी फैल गया था।
कमांडोज़ ने स्नाइपर्स को हाथ के संकेत से धन्यवाद किया फिर शस्त्रागार के दरवाजे के किनारे खड़े हो गए, दरवाजा बायोमेट्रिक लॉक से बन्द किया गया था जिसे बायपास करने के लिए एक कमांडो अपने उपकरण लेकर शुरू हो गया।
पर उसे असफलता हाथ लगी दरवाजा नहीं खुला। तो कमांडोज़ आतंकवादियों के शवों को उठाकर लाए फिर एक-एक कर सबका बायोमेट्रिक डेटा इनपुट करने लगे। पाँच बार तो इनपुट अवैध रहा छठवीं बार जब आतंकवादी का हाथ रखा तो सिस्टम ने इसे भी पहचानने से मना कर दिया और दो मिनट का टाइमर शुरू कर दिया अब अगला इनपुट दो मिनट बाद ही होगा।
यह देख कर वह कमांडो क्रोधित हुआ और उसने अपने कॉम्बैट नाइफ से पैनल उखाड़ दिया अंदर कुछ तार दिख रहे थे उन्हें छेड़े बिना उसने एक छोटा विस्फोटक अंदर रख दिया, पाँच सेकेंड बाद इस छोटे-से बम ने एक छोटा-सा विस्फोट किया "पुफ", इससे ताले का मैकेनिज्म छिन्न-भिन्न हो गया फिर तो बस थोड़ा सा धक्का देने से ही दरवाजा खुल गया।
दरवाजे पर नष्ट हुए समय की भरपाई करने के लिए कमांडोज़ दौड़ते हुए अंदर घुसे। शस्त्रागार पूरा भर हुआ था, एक पूरी बटालियन के लिए पर्याप्त हो इतने ग्रेनेड्स मशीनगंस आरपीजी इत्यादि हथियार वहाँ रखे गए थे।
और अंदर जाने पर अंततः कमांडोज़ को वह मिल ही गया जिसके लिए वे अंतरराष्ट्रीय सीमा पार करके आए थे, डर्टी बॉम्ब।
कहानी जारी है, मिलते हैं अगले भाग में………
लेखक - रितेश कुमार प्रजापति

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