ज्ञान जो विश्व को आगे बढाता है, मानव सभ्यता का विकास करता आया है, जिसने मनुष्य को अन्य जीवों से श्रेष्ठ बनाया है, जो हमेशा ऊंचाई का द्योतक है तथा भौतिक जीवन से आगे जो मानव को ईश्वर से मिलाता है, भला कैसे निरर्थक हो सकता है।

   जिस ज्ञान की तारीफ से सभी धर्मों की पुस्तकें भरी हुई हैं, क्या वह ज्ञान भी निरर्थक हो सकता है।

   ज्ञान जिसे श्रीमद्भगवद्गीता में भगवत्प्राप्ति का प्रथम साधन कहा गया है, भला किस तरह निरर्थक हो सकता है।

  कैकय देश के नरेश अश्वपति आज कल ज्यादा मुस्कराते रहते। अचानक ख्यालो में खो जाते। फिर चेहरे पर आती मुस्कान गहरा राज छोड़ने लगती।

  हंसमुख होना अच्छी बात है। प्रसन्न रहने बाला व्यक्ति हमेशा स्वस्थ रहता है। फिर भी बक्त बेबक्त इस तरह... ।नहीं कुछ तो रहस्य की बात है।

  क्या विचार में आया। कोई भी हास्य का अवसर नहीं है। एक व्यक्ति अचानक खुश होने लगता है। ऐसा लगता है कि वह अब इस लोक में ही नहीं है। कहीं खो गया है।

  क्या कहते हैं आप। यह तो किसी प्रेमी का लक्षण है। किसी ऐसे व्यक्ति का जिसका चित्त किसी ने चोरी कर लिया है। जो किसी से अपने दिल की बात कहने को तड़प रहा है। कोई प्रेमी अपनी प्रियतमा से मिलन को  व्यग्र हैं। जिसे अपने प्रेम के रूप में जीवन की नयी राह मिल गयी हो।

  सचमुच लक्षण तो यही हैं। जीवन में हर व्यक्ति एक न एक बार ऐसी दशा से गुजरता है। अनेकों बार प्रेम न होकर वह केवल आकर्षण होता है।

  प्रेम और आकर्षण एक से लक्षण रखती दो भावनाएं हैं। ज्यादातर प्रेम का आरंभ ही किसी आकर्षण से होता है। पर हर आकर्षण प्रेम हो, यह कब आवश्यक है।

  आकर्षण आरंभ है तो प्रेम परिणति। आकर्षण लघु है तो प्रेम बृहत।

   बिना किसी अन्य जानकारी के जो आपकी बुद्धि से सोचा, वह ठीक है। बिना किसी अन्य जानकारी के जो मेरी बुद्धि ऐसी स्थिति के विषय में सोच रही है, वह भी ठीक ही है। बिना अतिरिक्त जानकारी के प्रायः सभी के मन में यही बात घर करेगी कि राजा अश्वपति प्रेम जैसी असाध्य बीमारी के रोगी हैं। ऐसी मान्यता को तब तक सत्य ही समझा जायेगा जब तक कि कोई अन्य विशेष बात ज्ञात न हो जाये।

  हमारा, आपका तथा सभी का ऐसा विचार आना ठीक है। पर रानी का ऐसा ही विचार करना... ।

  रानी से भूल हो गयी। वह भी वही सोचने लगी जो हम आप सोच रहे हैं। आखिर उसे ज्ञात होना चाहिये कि महाराज जो उसके पति भी हैं, आजकल किसके ख्यालों में खोये रहते हैं।

  रानी जो महराज अश्वपति की पत्नी है, उसे ज्ञात होना ही चाहिये कि उसके प्रेम में दूसरा कौन भागीदार बनने बाला है।

   समय ऐसा ही था कि एक पुरुष का अनेकों स्त्रियों से विवाह करना कोई दोष न था। फिर राज परिवारों के पुरुषों के विवाह संबंध राजनीति को भी ध्यान में रखकर किये जाते थे।

   कोई पुरुष अपनी पत्नी के अतिरिक्त किसी अन्य स्त्री से प्रेम नहीं करेगा, ऐसा सोचना भी उस समय के अनुसार बेमानी था। पर क्या पत्नी का इतना भी अधिकार नहीं है कि वह अपने पति के मन को समझ सके।

  ठीक है कि आपका मन किसी के प्रेम में अनुरक्त है। ठीक है कि आप किसी अन्य को अपने जीवन का हिस्सा बनाना चाहते हैं। ठीक है कि आप मेरे जीवन में मेरे लिये एक सौत को लाना चाहते हैं। पर मुझे बिना बताये। नहीं यह तो ठीक नहीं।

  रानी का अनुरोध चलता रहा। महाराज हमेशा मना करते रहे। प्रतिज्ञा करते रहे कि उनके मन में रानी के अतिरिक्त कोई अन्य स्त्री नहीं है।

   यदि महाराज के मन में कोई अन्य स्त्री होती तो भला उन्हें कौन रोक सकता है। वैसे भी समाज में यह स्वीकार है। खुद रानी के पीहर में भी ऐसा होता रहा है।

   रानी का मन विभिन्न कल्पनाओं से घिरा था। राजा की बात सत्य मानने का कोई आधार नहीं है। फिर सत्य क्या है।

  अच्छा समझी। सत्य कुछ ज्यादा कठोर है। लगता है कि महाराज का मन जिस कन्या से अनुरक्त हुआ है, वह कन्या उन्हें दुर्लभ लग रही है। इसीलिये अपने प्रेम को भुला देना चाहते हैं पर भूल नहीं पा रहे। रह रहकर उसी की याद में मन को दग्ध कर रहे हैं।

  मैं महाराज की पत्नी पता कर ही लूंगी। फिर चाहे तो उस कन्या से खुद जाकर भीख मांगूंगी। उससे अनुरोध करूंगी कि मेरे पति का जीवन आपके बिना अधूरा है। उसे पूर्ण कर दें।

  ऐसी कल्पना आज की स्थिति में असंभव लगती हैं। पर बचपन से ही अपनी माताओं व दूसरी स्त्रियों से पति हित का ज्ञान पाती आयीं उस काल की स्त्रियों के लिये यह असंभव नहीं था।

   रानी ने अनेकों बार अनुरोध किया। अंत में अपने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। पर जब ईश्वर ही प्रतिकूल हों तो ब्रह्मास्त्र भी असफल हो जाता है।

  रानी कोपभवन में इसलिये बैठी थीं कि उन्हें सत्य जानना है। ताकि वह अपने पति के हित का उपाय तलाश सकें।

  आज महराज ने मात्र इतना कहा कि सत्य बताते ही उनका जीवन नहीं रहेगा।

  रानी महराज की निश्चित ही हितैषी थी। उससे मात्र इतनी भूल हुई कि वह महाराज का हित चाहती थी। अपने पति की खुशियों तलाशना चाहती थी।

   महाराज की बात समझने योग्य न थी। भला सत्य बताने से प्राणों का कैसा संकट।

   रानी की हठ भी असह्य होती जा रहा थी। 

   आखिर महाराज अश्वपति के भीतर बैठा पुरुष जग गया। दुर्भाग्य से उस दिन इतिहास की ऐसी घटना घटित हो गयी जिसे बाद में महाराज ने रोकना जरूर चाहा होगा। जब पुरुष अपना काम कर चुका होगा तो राजा के मन में बैठे प्रेमी के भाग्य में केवल और केवल रुदन रह गया हो।

   महर्षि याज्ञवल्क्य संहिता के अनुसार पति और पत्नी का संबंध जीवन भर का है। फिर भी कुछ अपरिहार्य परिस्थितियों में परित्याग का विधान है। यदि पत्नी को पति के प्राणों की परवाह न हो तथा दूसरी तरफ पति को पत्नी के प्राणों की परवाह ही न हो तो परित्याग कर अलग होना अधर्म नहीं अपितु आवश्यक है।

   महर्षि ने यह बात किस अर्थ में लिखी। क्रोध ने अर्थ को अनर्थ में बदल दिया। इतिहास में वह रानी पहली स्त्री बनी जिसे उसके पति ने परित्याग दिया।

   ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की कहानी लिखते समय लेखक को अधिकार दिये जाते हैं कि वह खुद से कुछ पात्रों को जोड़ सके। कुछ ऐसे पात्रों का नामकरण कर सके जिनका केवल उल्लेख मिलता हो।

   भारतीय इतिहास की प्रथम परित्यक्ता स्त्री का नाम किसी भी रचनाकार ने अपनी रचना में क्यों नहीं लिखा। इस प्रश्न के अनेको उत्तर हो सकते हैं। संभव है कि पुरुष वादी सोच के कारण अपने पति के प्राणों की परवाह न करने बाली स्त्री का नाम लेना ही उन्हें उचित न लगा हो।

  एक दूसरी संभावना यह भी है कि अपने पति का हित चाहते चाहते अपना सर्वस्व खो चुकी उस पति भक्ता स्त्री का नाम लेने की सामर्थ्य ही पुरुष रचनाकारों में न रही होगी। शायद जब भी उस स्त्री का नाम लिखने का प्रयास किया हो, मन में छिपी आत्मग्लानि ने उनकी लेखनी को ही रोक लिया हो।

   लेखक भी कैकय देश की रानी का कोई काल्पनिक नाम नहीं लिखेगा। यह शून्यता उस विचार शून्यता का प्रतिनिधित्व करती है जो एक पुरुष ने क्रोध की अवस्था में की थी। यद्यपि विभिन्न धर्म ग्रंथ भी यही मानते आये हैं कि क्रोध मति को हर लेता है। क्रोध की अवस्था सोचने समझने की शक्ति को रोक देती है।

   बड़े लोगों का एक बार आगे बढकर पीछे हटना असंभव होता है। राजा अश्वपति के मन में कोई अन्य कन्या नही थी। जीवन भर वह एकाकी ही रहे। शायद जीवन भर रानी की याद में तड़पते रहे। पर एक पुरुष कभी भी अपनी भूल सुधार पाने में असमर्थ रहा।

  कोई भी ज्ञान तभी सार्थक होता है जबकि उससे समाज का कुछ भला हो। अन्यथा ज्ञान निरर्थक ही होता है। पता नहीं कैसे जोश जोश में महाराज ने इस शर्त को स्वीकार कर पशु पक्षियों की भाषा सीख ली कि वह यह रहस्य कभी भी किसी को नहीं बतायेंगे। यदि महाराज ने किसी को भी यह रहस्य बता दिया तो उसी क्षण उनका प्राणांत हो जायेगा।

  कोई नहीं जानता था कि महाराज पशु पक्षियों की वार्तालाप को सुनकर उनके व्यवहार को समझकर मुस्करा जाते हैं। यह ज्ञान समाज के कार्य आ ही नहीं सकता था। हाॅ इस ज्ञान के कारण एक स्त्री का जीवन बिगड़ गया। सात बेटों व एक बेटी से माॅ का प्रेम छूट गया। सत्य यह भी है कि एक निरर्थक ज्ञान के कारण महाराज अश्वपति का जीवन बिना प्रेम के शुष्क बन गया।

क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'