पितर पक्षों में ये
कैसी मनु आशा
और अभिलाषा
नहीं समझ रहे
आज भूखे बुजर्गो के 
मन की भाषा

तड़पता मन
भूख से व्याकुल तन
सम्मान का
मानसिक खनन
तर्पण विधी में हजारों
पैसै लगा दिए
जीवित थे तब
दुत्कार कर
वृद्धाश्रम के
रास्ते दिखा दिए

जीवित थे तब श्रृद्धा नहीं
तब रहकर भी संग
अपनों की बेरुखी ने
इन्हें लाचार बना दिए
दूर,घर में ही कर
अपनों की भीड़ में भी
बेगाने से बना दिए

क्या जाकर इस लोक से
वो आशीर्वाद 
तुम्हे दे पाएंगे
करनी जो की तुमने
मात- पिता, बुजुर्गों के साथ
सभी कुछ क्या 
यहीं छोड़ जाएगें

देखो तो भाई
आज के जमाने के
इन खोखले,बनावटी 
रिश्तों का आडम्बर
आज के ये मायूस बुजुर्ग
कल देव पितर
ही तो बन जायेगें

बीती बात क्या
दिल से भुला पाएंगे
या रिक्त आंखों से ही
अलविदा जंग को
कह जायेंगें
चाह कर भी आशीर्वाद
के लिए वो कभी
हांथ उठा नहीं 
पाएंगें

देखो तुम्हारी
आज की ये 
आडम्बरी
स्वार्थी और
कुपोषित मानसिकता
देकर कष्ट पूर्व में
क्या ऐसे ही कल
पितर देव
पूजे जाएंगे।।

नाम  :  शीतल शैलेन्द्र सिंह राघव "देवयानि"