तेरे मन के भावों को
मैं बिन बोले समझती हूं
मेरे मन के भावों को तुम भी
बिन बोले समझते हो
तभी तो ये रिश्ता "हम-तुम" से
"हम" तक पहुंचता है।

जब शब्दों से ज्यादा
भावों का पता चलता है
जब ह्रदय के भावों को
कोई बखूबी समझता है
तभी तो ये रिश्ता "हम-तुम" से
"हम" तक पहुंचता है

अपने घर को छोड़ के पीछे
जब कोई स्त्री पराए घर में आती है
उस पराए घर को भी अपना घर बनाती है
और अपने व्यवहार से फिर
सबको अपना बनाती है
तभी इस "हम-तुम" के रिश्ते को
"हम" कहकर
बखूबी निभा पाती है

"हम-तुम" का साथ
सिर्फ "हम-तुम" से ही नहीं होता है
"हम-तुम" के साथ अपनो का भी
साथ होना जरूरी होता है
तभी तो ये रिश्ता "हम-तुम" से 
"हम"  तक पहुंचता है।

जितना सम्मान में सबको देती हूं
तुम भी मेरे रिश्तों को जब 
मान इतना देते हो
तो जिंदगी का सफर
हंसते हंसते आगे बढ़ता है
तभी तो ये रिश्ता "हम-तुम" से
"हम" तक पहुंचता है
और सभी का साथ पाकर
इक खुशी परिवार बनता है।
स्वरचित/मौलिक/
कविता गौतम ✍️