रोहन, बड़ा ही समझदार लड़का था l बचपन में अपने माता-पिता को खोने के बाद वह खुद को बहुत अकेला महसूस करने लगा l उसका लालन-पालन उसकी दादी ने किया l दादी ने उसे अपार स्नेह दिया परंतु अपने माता-पिता के स्नेह की तलाश उसे अपने जीवन में हमेशा रही l
कुछ समय बाद दादी का भी स्वर्गवास हो गया l रोहन अब इस संसार में अकेला रह गया था l उसकी सुख-दुख के साथी दादी भी आप उसके साथ नहीं थी l धीरे-धीरे समय बिता गया और रोहन  ने अपने आपको काम में इतना उलझा लिया कि अब उसके पास किसी बात के लिए समय नहीं रहा l
एक दिन रोहन जब ऑफिस घर से जा रहा था तो उसने देखा एक वृद्धा पार्क के गेट पर बैठी है l उसने वृद्धा को देखा और नज़र हटा ली l शाम को जब वह घर के लिए लौट रहा था तब भी उसकी नज़र पार्क के गेट पर थी l वृद्धा को उसी गेट पर बैठे देख हैरान हो गया l देखने में वह अच्छे भले घर की लग रही थी l रोहन ने ड्राइवर को गाड़ी रोकने के लिए कहा l गाड़ी से उतरकर वृद्धा के पास गया और बोला - आंटी आप यहाँ क्यों बैठे हैं l मैंने सुबह भी आपको यही बैठे देखा और अब भी l क्या आप किसी का इंतजार कर रही हैं l यह सुनकर वृद्धा की आँखों में आँ lसू आ गए l वह बोली - बेटा,मेरा बेटा मुझे यहाँ रुकने के लिए बोल कर गया है l मैं उसी का इंतजार कर रही हूँ l सामने वाली बिल्डिंग से दो लोग मुझे बुलाने भी आए थे परंतु मैंने उन्हें भी कह दिया है कि मैं अपनी बेटे का इंतजार कर रही हूँ और उसी के साथ जाऊँगी l वह मुझे लेने आता ही होगा l
 यह बात सुनकर रोहन तुरंत उस बिल्डिंग के अंदर गया l वह पूछने पर उसे ज्ञात हुआ कि वह केवल बिल्डिंग नहीं, एक वृद्धा आश्रम  है जहाँ  कई लोग अपने बूढ़े माता-पिता को छोड़कर जाते हैं l उस वृद्धा के बेटे ने भी उनका नाम रजिस्टर में लिखवाया हुआ है l इस कारण यहाँ  के लोग उन्हें बुला रहे हैं परंतु वह सच मानने से इंकार कर रही हैं l
यह सुनकर रोहित को बहुत आश्चर्य हुआ l वह फिर से वृद्धा के पास गया, और इस बार बड़े प्रेम से बोला -माँ जी, मुझे मालूम है आपका पुत्र आपको लेने आएगा परंतु आप सुबह से यहां पर बैठी है  l आपने कुछ खाया पिया भी नहीं है l थोड़ी देर अंदर चलिए, कुछ खा पी लीजिए l तब तक आपका बेटा भी आ जाएगा l यह सुनकर वृद्धा ने उसकी बात मान ली और अंदर चली गई l
वहाँ जाकर उसने देखा, कि उसकी उम्र के कई वृद्ध-वृद्धा उस आश्रम में रह रहे हैं l एक दो से बात करने पर मालूम हुआ कि सब की कहानी उसके जैसी ही है l वह फूट-फूट कर रोने लगी  और उसे अपने जीवन के सत्य का आभास हुआ lयह देखकर रोहन से न रहा गया है l उसने कहा -माँ जी, मैं भी आपका ही पुत्र हूँ l मैं यहाँ हर रविवार को आपसे मिलने आऊँगा l आप किसी भी बात की चिंता ना करें l आपको यहाँ किसी तरह की तकलीफ़ नहीं होगी l यह कहकर रोहन अपने घर लौट गया l घर लौटते वक्त का पूरा समय वहाँ रह रहे वृद्ध-वृद्धाओं के विषय में सोचता रहा l वह सोचने लगा कि कैसे संतान अपने माता-पिता से अलग रह सकती है l कोई मुझसे पूछ कर देखें माता-पिता के साए के बगैर जिंदगी कैसे कटती है l बस फिर क्या था रोहन हर रविवार वृद्धा आश्रम जाता और पूरा दिन वही बिताता l वृद्धा आश्रम चला रही संस्था के सदस्यों से बात करके वह का ट्रस्टी बन गया और वृद्ध आश्रम का खर्च उठाने लगा l वहाँ के लोगों से उसे इतना अपार स्नेह व अपनापन मिला कि वह अपने माता पिता की छवि उन लोगों में देखने लगा l रोहन ने जीवन भर वह वृद्धा आश्रम चलाने का निर्णय लिया क्योंकि उसे जिस ममता, प्रेम,अपनेपन की उसे तलाश थी वह तलाश यहाँ के लोगों से मिलकर पूरी हुई l वह अपने आप को सौभाग्यशाली समझने लगा और इसे भगवान का आशीष समझने लगा कि भगवान ने उसे दोबारा किसी न किसी माध्यम से उसे अपने माता-पिता की सेवा करने और उनसे अपार स्नेह पाने का मौका दिया l
रचनाकार -सुनीता कुमारी अहरी