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मां ममता की मूरत है,
और श्रष्टि की संचालक है।
यकीन करो माँ हर नन्हे से
मासूम शिशु की पालक है।

नहीं भेद शिशु और मेमने में,
अपनी छाती से चिपकायी है।
ईश्वर के बाद अगर कोई तो,
इस धरती पर माँ कहलायी है।।

आँचल से चिपका कर अपने,
ममता की नींद सुला देगी।
इस पावन सी मूरत देखो,
पाषाण हृदय को रुला देगी।।

माँ की बांहों का बिछा हुआ,
एक नर्म बिछौना मिल जाए।
यूँ तृप्त सुखद अनुभूति मिले,
ज्यों स्वर्ग का कोना मिल जाए।।
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स्वरचित,मौलिक
डॉ0 अजीत खरे