अकेलापन नहीं एकांत
अकेलापन एक अहसास है
जब दुनिया की भीड़ में भी
साथ नहीं देता कोई
तब सताता है अकेलापन
एकांत में सजती है
सद्विचारों की महफिल
संस्कारों की मजबूत इमारत में
अकेलापन तो नहीं
बहुधा भीड़ दुनिया की
विचलित कर जाती मन को
इतनी भीड़ में कोई साथ नहीं
उपहास मना रहे सिद्धांतों का
भीड़ में अकेला
अकेलेपन से त्रस्त वह इंसान
या तो पड़ जाता कमजोर
छोड़ अपनी अच्छाइयों को
दुनिया के साथ बढने लगता
बदल जाता
गलत बन जाता
हत्यारा आत्मा का
शक्तिशाली अलग
दुनिया के अकेलेपन को छोड़
एकांत को अपना लेते
अदम्य साहस पाते संस्कारों से
फिर चलने लगते एकला
वह बात अलग है
पीछे जुटता जाता कारवां
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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