"आज क्या क्या खरीदा आपने मेले में" दादी ने रिया से पूछा जो मेला घूमकर बहुत खुश लग रही थी। बच्चे भी न! कितनी मामूली सी बात पे खुश हो जाते हैं इन्हें खुशी देने के लिए बहुत बड़े तामझाम की जरूरत नहीं होती है। दादी मन ही मन रिया की खुशी देख मुस्कुरा रही थी।
   
       अरे!!! दादी बहुत सुंदर मेला था हमलोग खूब घूमें , फिर भाई और पापा संग झूला भी झूला मैंने... वो चकरी वाला ... ट्रेन वाला ... घोड़े वाला ...,
  
      "अरे बस बस... ये बताओ तुमने कुछ खाया पिया कि नहीं" दादी जानती थी रिया चुप होने वाली नहीं है तो उसने उसकी बातों पे विराम देते हुए पूछा।
  
      " हां दादी पापा ने हमें बहुत अच्छी अच्छी चीजें खिलाई आइसक्रीम, केक, गोलगप्पे वो भी मीठे वाले मूंगफली... " फिर कुछ सोचती हुई बोली " पर दादी आप रहती और मम्मी रहती तो हमें और बहुत मजा आता।" और वह निराश हो गई
    
      दादी रिया का उतरा चेहरा देख सोच में पड़ जाती है साल भर में एक बार तो ये दुर्गापूजा को मेला आता है मैंने बहू से कहा कि वो भी जाकर घूम आए मेरी फिक्र छोड़े मगर वह गई ही नहीं इन बच्चों के साथ ... अरे मेरा क्या है... धीरे धीरे कमजोर ही तो हो रही हूं...
 
        "इस साल घुटनों के दर्द ने परेशान कर रखा है वरना मेरी रिया को मैं अकेले थोड़े न जाने देती" रिया को दुलारते हुए दादी कहती है।
     
       "तुम चिंता न करो दादी मैं रोज तुम्हारे घुटनों पे मालिश कर दिया करूंगी फिर देखना कैसे तुम्हारे घुटने ठीक हो जाएंगे... पर बदले में प्रॉमिस करनी पड़ेगी तुम हमारे साथ मेला घूमने जरूर चलोगी" आठ साल की रिया चिंता करते हुए दादी को सांत्वना देती है।
   
       " जरूर मेरी बच्ची... अच्छा आपने तो मेरे पहले सवाल का जवाब दिया ही नहीं कि आपने मेले से क्या क्या खरीदा ?" दादी ने रिया की बात को बदलते हुए पूछा।
      
      " मैंने आपके लिए, मम्मा के लिए और अपने लिए भी खरीदारी की है" नन्ही रिया समझदार बन कर बोली।
   
     " अच्छा!!! मेरी बच्ची देखूं तो क्या क्या है" दादी ने उत्सुकता दिखाया।
    
     "देखो दादी आपके लिए ये टी सेट, मम्मी के लिए चूड़ियां और मेरे लिए ये सुंदर सी गुड़िया... रिया ने गर्व के साथ दादी को अपने शॉपिंग की जानकारी दी। दादी तो बस रिया की समझदारी पे खुश हो रही थी।
   
       "और ये इयररिंग्स किसके लिए है" दादी जानती थी अभी से ही रिया को इयररिंग्स का बहुत शौक है ।

       " वो... वो दादी ये... ये" रिया हकलाने लगी।
 
       " क्या हुआ पापा से छुपा के आपने इसे खरीदा है क्या?" दादी ने प्रेम से पूछा।
     
       " नहीं दादी... मैंने इसे दुकान वाले से नजरें बचा कर चुपके से उठा लिया है...!!!
रिया नजरें झुका कर बोली " प्लीज! दादी पापा मम्मी को मत बताना प्लीज़sss!!!
     
       " नहीं बताऊंगी पर क्या ये अच्छी बात है किसी को बताए बिना उसका सामान लेना... ये तो चोरी कहलाती है न रिया?" दादी उल्टा रिया से सवाल कर बैठी
   
       " पर मैं क्या करती दादी!!! पापा इसे मुझे खरीदने की परमिशन देते ही नहीं" रिया ने सफाई पेश किया
    
      " वो तो इसलिए मेरी बच्ची कि आप अभी छोटी हो बड़ी हो जाने पे ये सब पहनना ही है आपको...और अगर पापा आपको पैसे नहीं देंगे तो आप चोरी करोगे...?दादी समझा रही थी और रिया नजरें झुका कर अफसोस कर रही थी।
 
        " आप जानते हैं मेरी बच्ची की इस इयर रिंग्स की कीमत कितनी होगी... दादी ने रिया की तरफ देख कर कुछ क्षण रुक कर कहा ... ज्यादा से ज्यादा दस से पंद्रह रुपए ... पर आपने तो थोड़े से लालच के लिए इसकी काफी बड़ी क़ीमत चुका दी... अपनी ईमानदारी... आपने अपनी ईमानदारी उसी दुकान पे उसी पल छोड़ आईं जिस पल आपने ये इयर रिंग्स उठाए... ।दादी ने रिया को उसके घाटे वाले सौदे की जानकारी दी बहुत ही समझदारी के साथ।

       रिया फफक फफक के रो पड़ी " दादी मुझे मेरी ईमानदारी वापस चाहिए ... ये इयर रिंग्स नहीं चाहिए ।
 
     " चिंता न कर बेटा मैं अभी तुम्हारे पापा को इयर रिंग्स की असली कीमत देने और तुम्हारी ईमानदारी वापस लाने उसी दुकान पे भेजती हूं।
    
     ईमानदारी की कीमत समझ रिया अब अपने दादी संग मुस्कुरा उठी वहीं पीछे दरवाजे पे सारी बात सुन रही रिया की मां अपनी सास की समझदारी पे नतमस्तक हो गई।
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     स्वरचित व मौलिक:-     कीर्ति रश्मि "नन्द( वाराणसी)
छायचित्र:- आभार गूगल