चाहे धरती में गढ़ जाना हो
चाहे अग्नि में जल जाना हो
रास्ता कोई भी हो
उस मंजिल तक पहुंचने का
वहां पहुंचकर तो बस
कर्मो का ही साथ होता है।
सिर्फ ये निष्प्राण सा शरीर ही नहीं
जिंदा इंसान भी यहां ताबूत में कैद होता है।
जब जीते जी इंसान हैवान बन जाता है
मान- मर्यादा को जब मिट्टी में मिलाता है
आत्मा को जब अपनी नीलाम करता है
अच्छे-बुरे का ज्ञान जब वो कहीं खो देता है
तो मृत शरीर ही नहीं
जिंदा इंसान भी यहां ताबूत में कैद होता है।
कुछ भी करके सिर्फ जीतना ही
उसका मुकाम होता है
तो उस वक्त जिंदा इंसान भी
मुर्दे के समान होता है।
और एक बुराई के ताबूत में
वो कैद जैसे होता है
सिर्फ मृत शरीर ही नहीं
जिंदा इंसान भी ताबूत में कैद होता है।
मृत शरीर तो बेबसी में
ताबूत के भीतर सोता है
मगर जिंदा इंसान भी यहां
ताबूत में कैद होता है।।
स्वरचित(मौलिक)
कविता गौतम ✍️

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