पिया सजने संवरने के दिन ले गए।
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श्वेत वस्त्रों में लिपटी विरह गीत सी
सूनी महफ़िल के खामोश संगीत सी,
हेरती हूँ मैं खुद को समय हूँ मैं क्या
या नायिका हूँ किसी हार की जीत सी।
मेरी पहिचान का आंकलन ले गए।
पिया सजने संवरने के दिन ले गए।।
हूक रह-रह के दिल को जलाने लगी
फिर मुझे वो सुहागन याद आने लगी
जब आते थे तुम मेरे आईने की तरह
मेरी पाजेब ओ चूड़ी खनखनाने लगीं
मेरी कैसी परीक्षा ये कठिन ले गए।
पिया सजने संवरने के दिन ले गए।।
छीन कर मेरे सपने सजन ले गए
सुहागिन का मानस मिलन ले गए
आज बैठी तन्हा आईने के प्रत्यक्ष
मेरी रंगीनियों के पल छिन ले गए।
पिया सजने संवरने के दिन ले गए
पिया सजने संवरने के दिन ले गए।
स्वरचित,मौलिक
डॉ0 अजीत खरे

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