संध्या का समय होने को हैं
सूर्य देव भी सोने को हैं
चन्दा - तारे आने को है 
आसमाँ पर छाने को हैं 

कुछ गुमसुम  उदास उदास 
कोई ना था मेरे आसपास 
सर भी थोड़ा भारी भारी लगे 
कुछ बेचैनी सी मन में जगे

दिन में नींद भी कुछ कम सी आई 
अपने लियें एक प्याली चाय बनाई 
सोचा बैठ अकेले में चुस्किया लेते हुए
चाय का आनन्द लूँ यादें ताजा कर लूँ 

तभी पीछे से मेरी बिटिया ने 
अपने नन्हे नन्हे हाथो से 
मेरी आँखें बन्द कर पूछा
मम्मा चुप चुप हो क्या हुआ
हाथ पकड़ अपनी गोद में बैठाया
प्यार से उसके सर पर हाथ फिराया 
कुछ नही मेरी जान सर में दर्द हैं 
देखो ना हवा भी  कितनी  गर्म हैं

बोली माँ क्यों ना तुम भी बच्चा बन जाती
संग हमारे चुपमछुपाई ,पकड़ा पकड़ी ,
और भी कितने  प्यारे - प्यारे खेल 
मिलकर साथ हमारे क्यों नही खेलती 

देखो कितना मजा हैं आता 
सर दर्द तुम्हारा ठीक हो जाता 
सुनकर उसकी प्यारी - प्यारी बातें 
सब दुःख दर्द छू मंतर हो जातें ।।

            ...@ नेहा धामा " विजेता " बागपत , उत्तर प्रदेश