अपनी अपनी डफली अपना अपना राग
 महलों वालों के निराले है अंदाज।

महलों वाले बस अपनी गाते
 अपनी झूठी शान दिखाते,
 रुतबा, दिखावे की खातिर
 पैसा पानी सा बहाते,
मजबूरों को देते जूते से ही ढांप। 
महलों वालों के  निराले हैअंदाज।

रौंदकर धरती का सीना
 जिसने यह महल बनाए,
 हाय, दुर्भाग्य उनका
 वह झोपड़ी में ही रह जाएं ,
कब खुलेंगे उनके सोए भाग ।
महलों वालों के निराले हैं अंदाज।

कुदरत देखी तेरी अजब मैंने शान 
गरीब को अमीर करते पल का ना मान,
 रंक को राजा ,राजा को फकीर
 कब कर देगा भगवान डर उसका तू जान,
 माथे की लकीरों के बोलेंगे जब साज।
 महलों वालों की निराले हैं अंदाज़।

स्वरचित सीमा कौशल
 यमुनानगर हरियाणा