समय कभी नहीं रुकता। आगे बढता जाता है। फिर एक दिन सत्य का अहसास करा देता है।

  राजकुमारी कैकेयी सामर्थ्यशाली बनने के लिये पुरुषोचित तरीके से जी रही थी। पर समय ने अपना रूप दिखा दिया। शारीरिक बनाबट में यकायक बहुत बदलाव हुआ। मानो समय कैकेयी को वह सत्यता दिखा रहा हो जिसे वह देखकर भी अनदेखा करती रही थी। 

   युवावस्था के आरंभ में हर कन्या के रूप में निखार आता है। पर कैकेयी तो धरती पर रति का अवतार बन गयी। सर से लेकर नख तक सौंदर्य का पर्याय बन गयी। गौर वर्ण, काली आंखें, लहराते लंबे केश, तिरछी चितवन, मनमोहक मुस्कान, सब कुछ तो कैकेयी के पास था। 

   पुरुषों से वार्तालाप में कैकेयी को आरंभ से संकोच न था पर अब कुछ समय से अनायास ही चेहरे पर स्त्रियोचित लज्जा के भाव आ जाते। सिद्ध हो रहा था कि कितना भी प्रयास कर लो पर एक कन्या का लालित्य कोई भी उससे छीन नहीं सकता। 

  हालांकि बचपन से ही कैकेयी लड़कों की तरह रहती आयी थी पर अब उसका स्त्रियोचित श्रंगार करने का मन करने लगा। कभी कभी जब वह पूर्णतः स्त्रियोचित परिधान व श्रंगार करती तो किसी की नजर उससे अलग न होती। हालांकि वह इस तरह कम ही रहती थी। अभी भी उसकी पुरुषों से स्पर्धा जग जाहिर थी। एक अलग सोच ने कैकेयी को दूसरी कन्याओं से बिलकुल अलग बना दिया। 

   अब कैकेयी आयु की उस अवस्था को पार कर गयी जिस अवस्था में अक्सर कन्याओं का विवाह कर दिया जाता था। पर गुणों व रूप की खान होने पर भी उसका विवाह आसान न था। नयी सोच को अक्सर पुरुष स्वीकार नहीं कर पाते। एक संपन्न नरेश की पुत्री होने पर भी कैकेयी का विवाह आसान नहीं था। 

  अनुमान था कि कैकेयी से विवाह करने की चाह में देश के विभिन्न राजकुमार खुद प्रस्ताव भेजेंगे। आवश्यकता होने पर स्वयंवर द्वारा राजकुमारी खुद अपने मनोकूल वर का चयन करेगी। अथवा राजकुमारों के मध्य किसी प्रतियोगिता के आयोजन से भी उपयुक्त वर का चयन किया जायेगा। राज परिवारों में उन दिनों ऐसा ही चलन था। पर कैकेयी के विषय में ऐसे अनुमान गलत सिद्ध हो गये। 

  कैकेयी के स्पष्ट व्यवहार को स्वच्छंद व्यवहार माना जाता। कैकेयी की जीवन शैली के भी ज्यादातर आलोचक थे। उन सबके बाद भी एक अलग दोष उसका पीछा करता रहा। 

  कन्या के आचार विचार हमेशा माॅ से मिलते हैं। यह कितना सत्य है अथवा कितना गलत। पर वैवाहिक संबंधों में इन बातों का ज्यादा विचार किया जाता है। 

  लगता है कि ऐसी मान्यता पूर्णतः गलत भी नहीं है। पर जनश्रुति के विपरीत कैकेयी ऐसी माॅ की पुत्री थी जिसने हमेशा अपने पति का हित ही चाहा था। कभी भी अपने पति के मान को समाज में गिरने नहीं दिया। शायद कैकेयी भी अपने माॅ के समान ही निकलेगी। जिस तरह उसकी माॅ ने एक झूठे लांछन को स्वीकार किया, कैकेयी भी झूठे लांछन को उसी तरह गले लगाने में सक्षम होगी। 

   जिस आयु तक नवयुवकों का विवाह हो जाता था, कैकेयी उस आयु को भी पार कर गयी।सबसे अधिक चिंता महाराज अश्वपति को थी। पर हर चिंता के दूर होने का एक समय होता है। एक समय ऐसा आता है जबकि हताशा में जी रहा मनुष्य अपने भाग्य पर इठलाने लगता है। 

   तात्कालिक भारत में इक्ष्वाकु वंशी राजाओं की सदियों से तूती बोला करती थी। ऐश्वर्य और शक्ति में अयोध्या के राजा सर्वश्रेष्ठ रहे थे। उन्हीं के पराक्रम का परिणाम था कि अयोध्या नरेश चक्रवर्ती नरेश के रूप में सम्मानित होते आये थे। कहा जा सकता है कि समस्त उत्तर भारत के एकछत्र नरेश अयोध्या के परम प्रतापी महाराज दशरथ थे। स्वयं कैकय देश अवध देश के आधीन देश था। हालांकि अवध जैसे बड़े राज्य के आधीन होने पर छोटे राज्यों को लाभ ही अधिक था। आधिपत्य मात्र संरक्षण के लिये था। छोटे राज्य खुद में निर्णय लेने को पूर्ण स्वतंत्र थे। उन्हीं अवध नरेश महाराज दशरथ ने खुद के लिये राजकुमारी कैकेयी का हाथ मांगा। यह कैकय नरेश के लिये बड़े सम्मान और गौरव की बात थी। हालांकि वह खुद भी समझ नहीं पा रहे थे कि इसके पीछे क्या खास बजह है। 

  प्रेम वह दिव्य शक्ति है जो किसी के मन में छिपे सच्चे भावों को जान लेती है। केवल प्रेम ही जान पाता है कि ऊपर से कठोर लग रही एक कन्या वास्तव में भीतर से कितनी कोमल है। तथा राजकुमारी कैकेयी के जीवन में अचानक जो घटित होने जा रहा था, उसके पीछे भी वही प्रेम था। 

   वैसे तो इस प्रस्ताव को मना करने का प्रश्न ही नहीं था। हालांकि महाराज दशरथ पहले से विवाहित थे। पर उन दिनों के हिसाब से यह कोई अलग बात नहीं थी। फिर भी राजकुमारी की राय आवश्यक थी। महाराज अश्वपति के पूछने पर राजकुमारी कैकेयी ने अपनी नजरें नीची कर लीं। अपने संकोच के द्वारा अपनी सहमति दे दी। 

  उस रात कैकेयी को नींद नहीं आयी। स्वप्न में भी महाराज दशरथ के दर्शन हो रहे हैं। स्वप्न में भी प्रणय की क्रीड़ा हो रही थी। तथा याद आ रही थीं कुछ यादें जो बस उसी की यादें थीं। किस तरह आखेट के समय राजकुमारी के मन का भी आखेट हो गया था। लगता है कि उस दिन राजकुमारी भी अपने चितचोर का आखेट करने में सफल रही थी। जिसका प्रमाण अवध नरेश का भेजा विवाह प्रस्ताव था। 

क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'