कहां खो गए दिल की सुनी बस्ती बसाने वाले !
लौट कर चले आओ ,मकां को घर बनाने वाले !!

वक्त  के  हाथों  हर  पल  छले  से  रहते  हैं....
आभासी दुनिया के भ्रम में जगे से रहते हैं.....
कहां खो गए तुम ,थपकी दे देकर सुलाने वाले !
लौट कर चले आओ, मकां को घर बनाने वाले !!

बंद  ठंडे  कमरे  में  बहुत  घुटन  सी  होती है ......
मखमली बिस्तर पर कांटों की चुभन सी होती है...
कहां खो गए तुम , बंजर में पेड़ लगाने वाले !
लौट कर चले आओ , मकां को घर बनाने वाले !!

बुजुर्गों की छांव में,हंसता खेलता हो बचपन जहां..
इतनी बड़ी शहर में, ढूंढे कहो ऐसा आंगन कहां ..
कहां खो गए तुम, खत लिख कर बुलाने वाले !
लौट कर चले आओ, मकां को घर बनाने वाले !!
....✍️ स्वरचित 
पिंकी मिश्रा
भागलपुर बिहार ।