परे चले जाने में बड़ा सुःख है ;
छोटी सोच से,
अपनी  संकिर्णताओं से,,
जीवन के जोड़ -तोड़ के गणित से,,,
लाभ -हानि की परिधि से,,,
जगनिर्मित परिभाषाओं से..
अपने  स्वनिर्मित मापदंडो से ~
परे चले जाने में बड़ा सुःख है...

            ऊपर से नीचे झाँकने में भी बड़ा सुःख है ;
            पर्वतों की ऊँची श्रृंखला से....
            अपनी ऊँचीआकांक्षाओं से...
            अपनी पूर्ण विकसित मानसिकता से...
             अपनी तुच्छता के तिरोभाव से....
             विवेक की पूर्ण गरिमा से...
              झांकने में बड़ा सुःख है...


                     ©डॉ पल्लवी कुमारी "पाम "
                         अनिसाबाद, पटना