सपने देखना हमारे बस में नहीं होता।चाहें या न चाहें ,आँखो में आ ही जाता है।फिर ये तो मेरा ऐसा सपना था जो अनायास ही मेरी आँखों में आ बसा था।कब और कैसे ठीक से याद भी नहीं।उम्र कच्ची और कल्पनाओं के दायरे बढ़ने लगे थे।फिर क्या था ,मैं------कृतिका----अपने सपने के पीछे बस भागती रहती थी।

तब न दिन में चैन था न रात की सुध रहती थी मुझे।नई- नई पहचान जो हुई थी।बस दिमाग में सिर्फ वही घूमता रहता था।कैसे उसकी विवेचना करूँ।कैसे सपने का विस्तार करूँ।कहाँ से शुरुआत करूँ।हाथों से उसके मीठे,कोमल पंखों को सहलाऊँ या फिर यथार्थ की कठोर धरती पर तिलमिलाता छोड़ दूं।अतीत के पन्ने उधेड़ उसे दिखलाऊँ या भविष्य के सुनहरे सपनों की झलक दिखला दूँ।  किसी तरह उसे मुकम्मल करने की कोशिश में जुटी रहती थी।पर महीनों की मेहनत के बाद भी जब सपनों को हकीकत से कोसों दूर पाती तो मैं निराश -हताश हो जाती थी।कभी खीझ कभी गुस्सा सबकुछ आने लगता था।

लेकिन नियति तो कुछ और ही थी।उन दिनों मेरे स्वभाव में भी खासा बदलाव आ गया था।हमेशा उधम मचाने वाली मैं थोड़ी चुप सी हो गई थी।बस खयालों में गुम रहती,हमेशा कुछ सोचती रहती थी।माँ ने सबसे पहले इन बातों पर गौर किया।माँ तो माँ ही होती है।

अब आए दिन वह पूछतीं-"कृतु ,क्या बात है बेटा आजकल कुछ खोई खोई सी रहती है।कॉलेज में कुछ हुआ है क्या?"

"अरे नहीं माँ, कुछ भी नहीं बस पढ़ाई का थोड़ा प्रेशर है।"माँ चुप हो जाती थीं, लेकिन हर दूसरे दिन वही सवाल,कॉलेज में कुछ हुआ है,या दोस्तो से लड़ाई हुई है वग़ैरह वगैरह।
और मेरा भी एक ही जवाब होता कि ऐसी कोई बात नही है।पर माँ को मेरी बातें संतुष्ट न कर पाती थीं और वो थोड़ी परेशान हो गई।समय तो अपनी अवाध गति से चलता ही रहता है सो वह चलता रहा।

अचानक एक दिन जब मैं कॉलेज से घर आई तो माँ ने चाय नाश्ता दिया और मेरे कमरे में चली गई।मैंने ध्यान नहीं दिया ,और फ्रेश हो चाय लेकर अपने कमरे में गई तो देखा माँ मेरी डायरी लिए बैठी।कलेजा धक से हो गया, लो माँ ने तो सब पढ़ लिया होगा।मैं खिसिया कर माँ से कहने लगी- "माँ ये क्या,दूसरों की डायरी पढना अच्छी बात नहीं है, खुद ही सिखाती हो और खुद ही भूल गई।"पर ये बातें माँ के कानों तक नहीं गई।मेरा हाथ पकड़ उन्होंने मुझे अपने बगल में बिठाया और प्यार से सिर पर हाथ फेरते हुए कौतूहल से कहा"कृतु ,बेटा तू लिखती है,कहानियां,थोड़ी कविताएं ,कुछ गीत मैंने तेरी डायरी में देखा।"
मेरी निराशा अब रुलाई में बदल गई।माँ से लिपट मैंने कहा"माँ मैं लिखना और सिर्फ लिखना ही चाहती हूँ।मन के उदगार,खुशी आँसू सबकुछ पन्नों पर उकेरना चाहती हूँ।पर शायद ये मेरे बस की बात नहीं है।जब भी लिखने की कोशिश करती हूँ तो शब्दों के जाल में उलझ कर रह जाती हूँ।मैंने सोचा था कि कुछ पूरी तरह से लिख लूँ फिर तुम्हें दिखाऊँगी।अब तो लगता है मेरा ये सपना फसाना ना बन कर रह जाए।"
मेरी घिघ्घी सी बंध गई।

माँ ने मुझे खुद से अलग किया,आंसू पोछे और कहा-"किसी भी काम में हार नहीं माननी चाहिए।मैं ये तो नही जानती कि कहानी ,कविता वगैरह कैसे लिखते है पर एक बात बताती हूँ।"वो मेरा हाथ पकड़ मुझे आंगन में ले आईं और कहने लगी-"आसमान में देखो करोडों तारे है और एक अकेला चाँद,फिर भी चाँद की रोशनी उन टिमटिमाते तारों से बहुत ज्यादा तेज है पता है क्यों"?मैंने क्यों इशारे से पूछा
इन्होंने मेरे गाल पर एक चपत मार कहा "क्योकि तारे पूरे आसमान में बिखरे पड़े हैं और चंदा अपनी सारी चाँदनी बस खुद में समेटे हुए है।यदि सारे तारे मिलकर एक झुरमुट बना लें तो क्या चाँद की रोशनी फीकी न पड़ जाएगी ।मैंने तेरी डायरी में भी यही देखा,सारी रचनाओं में बस शब्द ही शब्द बिखरे पड़े है।उन्हें समेट कर झुरमुट बना।देखना तुम्हारी कल्पनाओं में बसी सारी रचनाएँ इसके नीचे आ कर बैठ जाएंगी।तुझे हिम्मत हारना तो मैंने नहीं सिखाया है।बस शब्दों को समेट और लिखना शुरू कर।सपने को फसाना बनते देर नही लगती ,हाँ उन्हें सच होने में समय ज़रूर लगता है।"

मैंने माँ को फिरसे गले लगा लिया और देर तक सुबकती रही।
मैं नही जानती की मैं अच्छी लेखिका बन पाई हूँ या नहीं, परआज जब मुझे साहित्य के किसी छोटे बड़े पुरस्कार मिलते है,या मेरी किसी किताब का विमोचन होता है तो सैकड़ो की भीड़ में भी मैं उनसे नज़रें बचा माँ की आखों के कोरो में छुपे  गर्व के आँसुओ को देख लेती हूँ और हर बार अपने सपने के सच होने का विश्वास हो जाता है।
मधुलिका सिन्हा
कोलकाता
मौलिक और सर्वाधिकार सुरक्षित