उसने भी अपने हाथों से उसे बाहों में जकड़ लिया।कुछ देर वे यूं ही एक दूसरे में खोए यूं ही खड़े रहे।
फिर अचानक राकेश ने शैव्या को छोड़ दिया और थोड़ा पीछे हुआ। शैव्या भी संभली।
आओ ,अंदर आओ_शैव्या सहज होने की कोशिश कर रही थी ।
राकेश अंदर आ कर ड्राइंग रूम में बैठ गया,घर को बहुत खूबसूरती से सजाया गया था ,एक बड़ी सी पेंटिंग शैव्या और रचित की दीवार पर लगी थी।
तब तक कोल्ड ड्रिंक और पानी लेकर शैव्या आ कर बैठ गई।
उसकी अदाएं और कातिलाना अंदाज देख कर ऐसा महसूस हो रहा था, कि आज किसी आशिक का कत्ल होने वाला है।
बातों का सिलसिला शुरू हुआ ,राकेश ने कहा ,और तुम्हारे पतिदेव कहां है?
मैने आपको बताया तो था , वे यूरोप ट्रिप पर गए हैं,15 दिन बाद आयेंगे।
ओह !!! मैं कैसे भूल गया,राकेश ने अजीब सा मुंह बनाया।
मतलब इस समय तुम अकेले हो?_राकेश खुश होते हुए बोला।
नहीं !¡! अकेली कहां ?
मतलब ?राकेश ने कहा।
मतलब ये... ,नजदीक आती हुई शैव्या राकेश के एक दम बगल में आकर बैठती हुई बोली _मतलब ये की आप हैं ना मेरे पास।
अच्छा!!! अब राकेश की सारी हिचक दूर हो गई।
उसने खींच कर शैव्या को बाहों में भर लिया और चूमने लगा।
शैव्या भी अब अपने में नहीं थी ,वह भी उसका साथ देती रही।
तभी कुकर की सीटी ने शैव्या का ध्यान भंग किया ,उसे याद आया कि उसने चावल चढ़ाया हुआ था।
राकेश से अलग होती ,उसने कहा _क्यों इतने उतावले हो ,पहले डिनर हो जाए।
उसके बाद उसने बड़े प्यार से डिनर परोसा ,दोनों ने खाना खाया।
उसके बाद राकेश उसके बेड रूम में आ गया।थोड़ी देर में शैव्या भी एक काली झीनी छोटी नाइटी में जब कमरे में आई तो राकेश का दिल बल्लियों उछलने लगा।
उसके बाद दोनों ने अपनी अपनी मर्यादा की सीमा लांघ दी।
शैव्या ने उस बिस्तर पर जहां रचित का पवित्र प्रेम था, उसे अपनी रंगरेलियों से अपवित्र कर दिया।इसमें वासना की भूख थी।
सुबह सुबह राकेश उठ कर अपने घर चला गया।
इसी तरह उनका रोमांस रात के अंधेरों से शुरू हो सुबह के उजाले में खत्म हो जाता ।
10 दिन हो गए थे रचित को यूरोप गए हुए।
जब भी रचित , शैव्या को फोन करता वह बाहर ही रहती ,ढंग से बात न करती ,उसे लगा शायद शैव्या मुझसे रूठी हो।
उसने अपने भाई से कहा ,शेखर एक बार जाकर भाभी को देख आओ,बेचारी परेशान होगी अकेले,और मेरे बेडरूम में मेरी आलमारी में पासबुक रखा है ,कुछ पैसे का हिसाब नहीं मिल रहा है,बैंक जाकर एंट्री करवा लेना।
शेखर बिना फोन किए ,अगले दिन भाई के घर पहुंच गया।
शैव्या ने दरवाजा खोला,सामने शेखर को देख घबरा गई।वह बाहर जाने को तैयार थी।
आज उसका राकेश के साथ दमदमा लेक देखने जाने का प्रोग्राम था,ये बहुत सुंदर और शांतिपूर्ण स्थल था,यहां प्रवासी पक्षी बड़ी संख्या में आते हैं।1947 में अग्रेजों ने यह लेक वर्षा जल संचयन के लिए बनवाया था।
उसने हकलाते हुए कहा _अरे शेखर ,यहां कैसे ,फोन कर देते ।
अगर मैं बाहर चली गई होती तो ,तुम बाहर रह जाते।आओ अंदर आओ।
अरे भाभी इस फ्लैट की दूसरी चाभी मेरे पास थी, मैं बैठ कर इंतजार कर लेता।
क्या?तुम्हारे पास फ्लैट की दूसरी चाभी थी।
हां,एक्चुअली तीन चाभी है ,एक आपके पास ,एक घर पर,और एक भैया के पास ।
शैव्या को बहुत गुस्सा आ रहा था ,उसका मन कर रहा था की रचित का गला घोंट दे।मतलब प्राइवेसी नाम की कोई चीज नहीं इसके जीवन में।
अरे भाभी क्या सोचने लगी ।मुझे भैया ने पासबुक लेने भेजा था_शेखर ने कहा।
चलिए बेडरूम में उनकी आलमारी से पासबुक निकाल लें।
अरे तुम बैठो ,पानी पियो , मैं अभी लाती हूं,पासबुक।
शैव्या पानी देकर अंदर गई।वहां कुछ कपड़े राकेश के रखे थे ,तुरंत उसे उठा अपनी आलमारी में डाला,और जल्दी से राकेश को मैसेज किया ,शायद आज मैं घूमने नहीं का पाऊंगी ,मेरा देवर आया हुआ है।
तब तक घूमता फिरता शेखर भी कमरे में आ गया।
मेंस परफ्यूम की तेज सुगंध घर में फैली थी। शैव्या जल्दी जल्दी रचित की आलमारी से पासबुक निकाल कर शेखर को पकड़ा दिया।
उसकी आंखों में डर साफ दिख रहा था,ऐसा लग रहा था हिरनी के सामने कोई शेर आ गया हो।
आखिर शेखर ने पूछ ही लिया ,भाभी क्या आप मेंस परफ्यूम लगाती हैं।
अरे नहीं भैया ,तुम्हारे भैया का था ,वो आलमारी कल खोला था तो गिर गई थी उसी की खुशबू कल से कमरे भर में फैली है।
लेकिन भाभी ये तो एक्लिप्स का परफ्यूम है ,भैया तो इक्लैट को छोड़ कोई और परफ्यूम लगाते नहीं।
भैया मैने उन्हें गिफ्ट किया था_शैव्या ने सफाई दी।
खैर भाभी मैं निकलता हूं,बैंक से सीधे घर निकल जाऊंगा।आप ठीक हो न_शेखर ने कहा।
हां हां, मैं ठीक हूं,कुछ खाना तो खा लो।
नहीं भाभी अभी भूख नहीं है ।भूख लगी तो रास्ते में कुछ खा लूंगा_शेखर ने कहा।
शेखर के जाते , शैव्या ने दरवाजा बंद किया ,और जाकर बिस्तर पर धड़ाम से लेट गई।
उसे लग रहा था कि थोड़ी देर अगर शेखर रुका तो उसका सर फट जाएगा ,दिल बैठ जाएगा ,पुलिसिया सवाल और पैनी निगाह उसे अंदर तक चीर गई थी।
राकेश का कुछ देर बाद फोन आया ,उसका फोन उठाने का मन नहीं कर रहा था।वह एक बार बुरी तरह डर गई थी।
जब व्यक्ति गलत होता है ,तो उसके अंदर एक अनजान डर समा जाता है।
बार बार राकेश के फोन आने पर उसने थक कर फोन उठाया ,और पूरी बात बताई।
क्रमशः

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