फ्लाइट ने उड़ान भरी और विमान हवा से बातें करता हुआ ऊपर की ओर आसमानों में छुप सा गया। जिविका विंडो सीट पर बैठ कर बादलों की उठखेलियां को निहार रही थी। उसकी भिनी भिनी मुस्कान को देखकर करण भी काफी खुश था। दोनों चुपके चुपके से एक दूसरे को देख रहे थे। करण जिविका से बात करना चाहता था परन्तु जिविका कुछ शर्मा रही थी क्योंकि करण के साथ ऐसे पहली बार कहीं जा रही थी। धीरे धीरे दोनों की बातें शुरू हो गयी और बातें करते कब आंख लग गई पता ही न चला। कुछ समय बाद जब उनकी नींद टूटी तब विमान के प्रस्थान का समय हो गया। सीट बेल्ट का निशान हटते ही सब फ्लाइट से बाहर जाने लगे जिविका और करण भी बाहर आ चुके थे और अपने ठहरने के स्थान पर चल निकले। उनके ठहरने की व्यवस्था पैंट हाऊस में की गई थी क्योंकि ट्रिप काफी लंबे समय का था। जीविका पेरिस जाने के बाद काफी खुश थी और मन ही मन अपने ट्रिप के सपने बुने जा रही थी। करण जल्द से जल्द हाउस में जाकर विश्राम करना चाहता था। दोनों ने अपने कमरे में जाकर सारा समान सेट किया और जल्दी से फ्रेश होकर विश्राम करने लगे करण बिस्तर पर जाते ही सो गया परन्तु जिविका कुछ सोच रही थी। वह अपने ट्रिप के साथ अपने सपनों की उड़ान को पंख देने का ख्वाब भी सजा रही थी....।
क्रमशः अगले भाग में।
प्रिया धामा

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