अंधकार के सीने पर, जो वार करे मैं वो दीपक
जब दिनकर थककर सो जाए, उजियार करे मैं वो दीपक।
मैं तिमिर नाशने वाला हूं, हां मैं ही तो उजियाला हूं
रजनी को पी लूं पलभर में, हां मैं ऐसा मतवाला हूं
नशा निशा का चूर कर, अंधकार हरे मैं वो दीपक
जब दिनकर थककर सो जाए, उजियार करे मैं वो दीपक।
चाहे जीवन या मन में हो, हरता मैं सब अंधियारा हूं
हर लूं जीवन से अंधकार, अंधियारे का हत्यारा हूं
पावन, पुलकित नव जीवन को जो प्यार, करे मैं वो दीपक
जब दिनकर थककर सो जाए, उजियार करे मैं वो दीपक।
छोटा-सा हूं, नन्हा-सा हूं, एक फूंक में बुझ जाऊंगा
परमारथ के काज में, खुद प्राण भी तज जाऊंगा
अंधेरों के साये में स्वप्न, साकार करे, मैं वो दीपक
जब दिनकर थककर सो जाएं, उजियार करे मैं वो दीपक।
हूं भास्कर सुत, मैं अग्निपुत्र, खुद खाक में मिल जाऊंगा
जब राह कठिन होगी तम से, खुद राह में मिल जाऊंगा
छोटी-सी लौ से अपनी तम को, लाचार करे, मैं वो दीपक
जब दिनकर थककर सो जाए, उजियार करे मैं वो दीपक।
......................✍️दीनदयाल गौर

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