मोहन बंगले की कालबेल बजाने के लिए गाड़ी से बाहर आया थोड़ी देर बाद बंगले का गेट खुलता है मोहन कार को बंगले के कम्पाऊण्ड में ले जाकर खड़ी कर देता है फिर कार से उतर कर कार का दरवाजा खोला। गार्गी कार से उतर कर सीधे बंगले के अंदर बने आफिस में पहुंचती है। आफिस की कुर्सी पर एक सुदर्शन व्यक्तित्व का आदमी बैठा हुआ कुछ पेपर देख रहा था उसकी नज़र जैसे ही गार्गी पर पड़ी वह अपनी कुर्सी से उठकर खड़ा हो गया।
" भाभी जी आप यहां मेरे आफिस में आपने आने का कष्ट क्यों किया मुझे ही बुला लिया होता"
उस आदमी ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा।
" शेखर भैया काम ही ऐसा है कि, मुझे आना पड़ा गार्गी ने गम्भीर मुद्रा में जवाब दिया।
शेखर नौकर को चाय नाश्ता लाने के लिए कहता, " नहीं शेखर भैया आप को औपचारिकता करने की जरूरत नहीं है यह मेरा भी घर है अगर मुझे कुछ खाने पीने की जरूरत महसूस होगी तो मैं खुद ही मालती से कह दूंगी। अभी यह सब रहने दीजिए मुझे कुछ जरूरी बात तुमसे करनी है पहले वह काम खत्म हो जाए तो चाय नाश्ता भी हो जाएगा" गार्गी ने सपाट स्वर में कहा।
शेखर गार्गी का भावहीन चेहरा देखकर मन ही मन सोचने लगा कोई महत्वपूर्ण बात है तभी गार्गी भाभी स्वयं यहां आईं हैं।
" चलिए पहले आपसे पूंछ ही लेते हैं कि,आप मुझ नाचीज़ के पास क्यों आई हैं"? शेखर ने मुस्कुराते हुए अदब से पूछा
शेखर की बात सुनकर गार्गी का चेहरा कठोर हो गया उसने शेखर से कहा शुरू किया जैसे जैसे गार्गी बताती जा रही थी शेखर के चेहरे की बेचैनी बढ़ती जा रही थी उसके चेहरे पर आश्चर्यचकित करने वाले भाव दिखाई देने लगे।
गार्गी ने अपनी बात समाप्त की और कहा "शेखर मुझे लगता है कि, तुम मेरी बात अच्छी तरह समझ गए हो मेरे कथनानुसार सभी जरूरी कागज तैयार करवा लो मैं फिर तुमसे मिलने आऊंगी" गार्गी ने कहा और कुर्सी से उठकर खड़ी हो गई।
गार्गी को खड़े हुए देखकर शेखर जैसे होश में आ गया वह गार्गी की बातें सुनकर कर सकते में आ गया उसने कहा " भाभी जो आप कह रहीं हैं क्या उस विषय पर आपने अच्छी तरह विचार कर लिया है। मैं मानता हूं कि,रूद्र गलत रास्ते पर चल रहा है पर यह काम तो वह वर्षों से कर रहा है। पहले तो कभी आपके मन में ऐसा विचार नहीं आया अब शादी के इतने वर्षों बाद यह विचार आपके मन में कैसे आया यह मेरी समझ से परे है।आप एक बार फिर से सोच लीजिए कहीं ऐसा न हो कि,बाद में आपको अपने फैसले पर अफ़सोस हो" शेखर ने परेशान लहज़े में कहा गार्गी की बात सुनकर शेखर के चेहरे पर चिंता के बादल मंडराने लगे थे।
" मैंने अच्छी तरह सोच विचार करने के बाद ही यह क़दम उठाया है मुझे इस विषय पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता नहीं है जैसा मैंने कहा है वैसा करो" गार्गी ने गम्भीर लहज़े में जवाब दिया।
" भाभी जी मेरे कहने का तात्पर्य यह•••••यहह" शेखर की बात अधूरी रह गई।
उससे पहले ही गार्गी ने गम्भीर मुद्रा में कहा" मुझे लगता है कि, मुझे किसी दूसरे वकील के पास जाना पड़ेगा"
" नहीं भाभी जी ऐसा न कहिए आप बैठिए है आप जैसा चाहतीं हैं मैं उसी तरह सभी पेपर तैयार करवा लूंगा आप निश्चित रहिए और जब-तक काम पूरा नहीं हो जाएगा मैं किसी को कुछ नहीं बताऊंगा" शेखर ने गार्गी से हाथ जोड़कर कहा
" ठीक है पर मैं बैठूंगी नहीं क्योंकि मुझे कुछ और जरूरी काम निपटाने हैं" गार्गी ने गम्भीर लहज़े में कहा और वहां से चलीं गईं।
शेखर आश्चर्य के भाव लिए गार्गी को जाते हुए देखता रहा।
गार्गी कार में आकर जैसे ही बैठी कार बंगले के गेट से बाहर निकल कर सड़क पर दौड़ने लगी।
" छोटी मालकिन अब हवेली चलें" ? मोहन ने पूछा
" नहीं इस पते पर चलो" गार्गी ने पता बताया और मोहन ने कार उस दिशा की ओर मोड़ ली लगभग एक घंटे बाद मोहन ने कार एक शानदार बंगले के कम्पाऊण्ड में लाकर खड़ी की गार्गी कार से उतरकर बंगले के अंदर चली गई।
लगभग दो घंटे बाद गार्गी बाहर आई और गार्गी के कार में बैठते ही फिर से कार सड़क पर दौड़ने लगी इस बार गार्गी ने जो पता बताया उसे पते को सुनकर मोहन ने चौंककर गार्गी को देखा।
गार्गी ने मोहन के चेहरे के भाव को पढ़ लिया और बहुत सपाट स्वर में बोली " तुम्हें चौंकने की जरूरत नहीं है कभी कभी कुछ काम ऐसे भी करने पड़ते हैं जिनको करने की उम्मीद नहीं होती"
थोड़ी देर बाद गार्गी की कार एक बंगले के सामने खड़ी हुई इस बंगले के आसपास कोई और घर नहीं था। गार्गी ने कार से उतर कर बंगले के दरवाजे की कालवेल बजाई थोड़ी देर बाद दरवाजा खुला एक अधेड़ उम्र की औरत गार्गी के सामने खड़ी हुई थी। उसने पूछा "आप कौन हैं किससे मिलना है "?
गार्गी ने गहरी नज़रों से उस औरत को देखते हुए कहा " मैं गार्गी ठाकुर हूं मुझे सुनैना जी से मिलना है"
गार्गी नाम सुनकर जैसे उस औरत को सांप सूंघ गया फिर उसने हकलाते हुए कहा " आप गार्गी ठाकुर हैं अंदर आइए अंदर आइए" उस औरत ने बहुत सम्मान के साथ एक तरफ़ हटते हुए कहा।
" कौन है रधिया काकी"? अंदर से सुनैना की आवाज सुनाई दी तब तक सुनैना की नज़र गार्गी पर पड़ी उसके मुंह से आश्चर्य से निकला " गार्गी तुम यहां मेरे घर में"?
" हां सुनैना मैं यहां मुझे अपने घर में देखकर तुम्हें विश्वास नहीं हो रहा होगा पर मैं सपना नहीं सच्चाई हूं और तुम्हारे सामने खड़ी हुई हूं मुझे बैठने के लिए नहीं कहोगी वैसे ठाकुर साहब ने बहुत आलीशान घर रहने के लिए दिया है" गार्गी ने गहरी नज़रों से देखते हुए मुस्कुरा कर कहा
" हां••• हां क्यों नहीं आओ बैठो" सुनैना ने कहा उसके चेहरे पर अभी भी अविश्वास की परछाई दिखाई दे रही थी।उसकी निगाहें जैसे पूंछ रहीं हों तुम यहां क्यों आई हो।
" सुनैना ज्यादा हैरान होने की जरूरत नहीं है कभी कभी जीवन में कुछ ऐसा घटित हो जाता है जिसके विषय में हमने कभी कल्पना भी नहीं की होती कभी कभी आकाश और धरती भी आपस में मिल जाते हैं।हम यह जानते हैं कि,वह हमारा भ्रम है फिर भी उसे हम हकीक़त मान लेते हैं हम दोनों आकाश और धरती की तरह हैं जो दूर से देखने में एक-दूसरे से मिले हुए लगते हैं परंतु हकीक़त में ऐसा नहीं है मैं यह सब क्यों बता रहीं हूं यह तुम्हारी समझ में नहीं आएगा मैं तुमसे सीधी सीधी बात करती हूं"
सुनैना मैं यह अच्छी तरह जानती हूं कि, तुम्हारा और रूद्र का क्या रिश्ता है उस रिश्ते को हमारा समाज अच्छी नज़रों से नहीं देखता दुनिया की नज़रों में मैं रूद्र की पत्नी हूं और तुम उनकी सहेली पर वास्तव में तुम उनकी पत्नी हो क्योंकि रूद्र के दिल पर तुम्हारा राज है तुम्हारा ऐसा सोचना है जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है।
" तुम यह सब मुझे क्यों बता रही हो यह मुझे पता है तुम मेरे मन में रूद्र और उनकी मां के ख़िलाफ़ ज़हर भरने की कोशिश कर रही हो" सुनैना ने गार्गी को घूरते हुए कहा।
" तुम कुछ नहीं जानती हो मैं तुम्हें रूद्र और उसकी मां का असली चेहरा दिखाना चाहती हूं इसके लिए तुम्हें निमंत्रण देने आई हूं आज से 15 दिन बाद ठाकुर हवेली आ जाना तुम्हें तुम्हारे प्रश्नों के उत्तर मिल जाएंगे की मैं यहां क्यों आई हूं और तुम्हें ठाकुर हवेली में क्यों बुला रही हूं।अब वर्षों से चले आ रहे पर्दे के पीछे खेले जाने वाले नाटक से पर्दा उठने वाला है" गार्गी ने व्यंग्यात्मक मुस्कुराहट के साथ कहा।
" तुम कहना क्या चाहती हो साफ़ साफ़ कहो गोल-मोल बातें मुझे पसंद नहीं है" सुनैना ने चिढ़कर कहा
" मेरी गोल-मोल बातों का अर्थ 15 दिन बाद तुम्हें मिल जाएगा और हां यदि तुम वास्तव में सच जानना चाहतीं हो तो मैं यहां आई थी और मैंने तुम्हें ठाकुर हवेली में बुलाया है यह सब रूद्र से न कहना अगर तुमने ऐसा किया तो मेरा तो कुछ नहीं बिगड़ेगा नुकसान तुम्हारा होगा वह भी बहुत बड़ा जिसकी भरपाई कभी हो नहीं पाएगी।अब फैसला तुम्हें करना है मैं चलती हूं मुझे पूरा विश्वास है कि,हम 15 दिन बाद ठाकुर हवेली में जरूर मिलेंगे" गार्गी ने गम्भीर लहज़े में कहा और सोफे से उठकर खड़ी हो गई।
" गार्गी बैठो एक एक कप चाय हो जाए पता नहीं ऐसा मौका दोबारा मिले या न मिले" सुनैना ने मुस्कुराते हुए कहा
" ठीक है चाय मंगाओ तुम भी क्या याद रखोगी किस रईस से पाला पड़ा था"
गार्गी ने हंसते हुए कहा
तभी रधिया काकी चाय लेकर हाजिर हो गई,चाय देखकर गार्गी और सुनैना दोनों ने हंसते हुए कहा "शैतान का नाम लिया शैतान हाज़िर"
" मैं शैतान नहीं हूं बहूरानियों" रधिया काकी ने हंसते हुए कहा।
चाय पीने के बाद गार्गी चली गई सुनैना सोचने लगी क्या मुझे ठाकुर हवेली जाना चाहिए या नहीं कहीं गार्गी कोई चाल तो नहीं चल रही है।उसे तो मुझसे नफ़रत होनी चाहिए क्योंकि उसका पति मुझे प्यार करता है यह बात वह जानती है फिर वह इतने अच्छे तरीके से कैसे बात कर सकती है।
" क्या सोच रही हो बहूरानी"? रधिया ने पूछा
" काकी मैं गार्गी के विषय में सोच रही हूं वह यहां क्यों आई थी मुझे ठाकुर हवेली क्यों आने के लिए कह रही है कहीं ऐसा तो नहीं कि वह मुझे रूद्र की नज़रों में गिराना चाहती हो।अगर ऐसा हुआ तो मेरा क्या होगा आप तो रूद्र को अच्छी तरह से जानती हैं अगर वह किसी से नाराज़ हो जाता है तो फिर उसकी तरफ़ मुड़कर नहीं देखता यही सोचकर मेरा मन डर रहा है मैं कोई निर्णय नहीं ले पा रही हूं" सुनैना ने परेशान होते हुए कहा।
" बहूरानी छोटा मुंह बड़ी बात पर मैंने भी दुनिया देखी है मुझे तो गार्गी बहूरानी की बातों से चालाकी का आभास नहीं हो रहा था। मेरे विचार से आपको वहां जाना चाहिए" रधिया काकी ने समझाते हुए कहा।
" ठीक है काकी मैं जाऊंगी अब जो होगा देखा जायेगा शायद इसमें भी कोई अच्छाई छिपी हो" सुनैना ने लम्बी सांस लेकर कहा।
दूसरी तरफ गार्गी जब ठाकुर हवेली पहुंची तो पार्वती जी और रूद्रप्रताप हाल में बैठे हुई चाय पी रहे थे। गार्गी को देखते ही पार्वती जी ने गुस्से में पूछा " बिना बताए कहां गई थी सुबह की निकली हुई शाम को घर आ रही हो "??
" मां जी मैं आपकी दूसरी बहू से मिलने गई थी आपके बेटे की दूसरी पत्नी से" गार्गी ने मुस्कुराते हुए कहा
" तुम्हें क्या हो गया है बहू तुम किसी भी बात का सीधे-सीधे जवाब नहीं दे रही हो पहले तो तुम ऐसा कभी नहीं करतीं थीं अब तुम्हें क्या हो गया है"? पार्वती जी ने चिढ़ते हुए कहा
" यह सब तो मैंने आपसे ही सीखा है मां जी" गार्गी कहते हुए फिर मुस्कुराई।
ठाकुर रूद्रप्रताप ने गुस्से में घूरते हुए गार्गी को देखा "ऐसे क्यों देख रहें हैं ठाकुर साहब कहीं आपको यह डर तो नहीं है कि यह राज बुआ जी जान जाएंगी" गार्गी ने मुस्कुराते हुए पूछा
"मुझे तो लगता है यह हवेली दफ़न हुए राज का मकबरा बनकर रह गई है। कहां यह हवेली खुली हुई किताब थी जिसमें प्रेम, त्याग,करूणा, परोपकार, सत्य, अहिंसा, ईमानदारी, और अपनेपन के गीत लिखे हुए थे जिसे हर व्यक्ति पढ़ सकता था। लेकिन अब यह षड्यंत्रों का अड्डा बन गई है मेरा यहां दम घुटने लगा है" लक्ष्मी ने गुस्से में कठोरता से पार्वती और रूद्र को देखते हुए कहा।
तभी मोहन ने आकर बताया कि, पार्वती के भाई और पिता आए हुए हैं हो रही बात वही रूक गई।
" पार्वती के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई वह आगे बढ़कर अपने पिता और भाई के स्वागत करने के लिए खड़े हुई।
तभी वहां पार्वती के पिता भवानी ठाकुर और भाई कुंदन ने किया••••• क्रमशः
दिल में चुभी किरिंच भाग 5
मोहन बंगले की कालबेल बजाने के लिए गाड़ी से बाहर आया थोड़ी देर बाद बंगले का गेट खुलता है मोहन कार को बंगले के कम्पाऊण्ड में ले जाकर खड़ी कर देता है फिर कार से उतर कर कार का दरवाजा खोला। गार्गी कार से उतर कर सीधे बंगले के अंदर बने आफिस में पहुंचती है। आफिस की कुर्सी पर एक सुदर्शन व्यक्तित्व का आदमी बैठा हुआ कुछ पेपर देख रहा था उसकी नज़र जैसे ही गार्गी पर पड़ी वह अपनी कुर्सी से उठकर खड़ा हो गया।
" भाभी जी आप यहां मेरे आफिस में आपने आने का कष्ट क्यों किया मुझे ही बुला लिया होता"
उस आदमी ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा।
" शेखर भैया काम ही ऐसा है कि, मुझे आना पड़ा गार्गी ने गम्भीर मुद्रा में जवाब दिया।
शेखर नौकर को चाय नाश्ता लाने के लिए कहता, " नहीं शेखर भैया आप को औपचारिकता करने की जरूरत नहीं है यह मेरा भी घर है अगर मुझे कुछ खाने पीने की जरूरत महसूस होगी तो मैं खुद ही मालती से कह दूंगी। अभी यह सब रहने दीजिए मुझे कुछ जरूरी बात तुमसे करनी है पहले वह काम खत्म हो जाए तो चाय नाश्ता भी हो जाएगा" गार्गी ने सपाट स्वर में कहा।
शेखर गार्गी का भावहीन चेहरा देखकर मन ही मन सोचने लगा कोई महत्वपूर्ण बात है तभी गार्गी भाभी स्वयं यहां आईं हैं।
" चलिए पहले आपसे पूंछ ही लेते हैं कि,आप मुझ नाचीज़ के पास क्यों आई हैं"? शेखर ने मुस्कुराते हुए अदब से पूछा
शेखर की बात सुनकर गार्गी का चेहरा कठोर हो गया उसने शेखर से कहा शुरू किया जैसे जैसे गार्गी बताती जा रही थी शेखर के चेहरे की बेचैनी बढ़ती जा रही थी उसके चेहरे पर आश्चर्यचकित करने वाले भाव दिखाई देने लगे।
गार्गी ने अपनी बात समाप्त की और कहा "शेखर मुझे लगता है कि, तुम मेरी बात अच्छी तरह समझ गए हो मेरे कथनानुसार सभी जरूरी कागज तैयार करवा लो मैं फिर तुमसे मिलने आऊंगी" गार्गी ने कहा और कुर्सी से उठकर खड़ी हो गई।
गार्गी को खड़े हुए देखकर शेखर जैसे होश में आ गया वह गार्गी की बातें सुनकर कर सकते में आ गया उसने कहा " भाभी जो आप कह रहीं हैं क्या उस विषय पर आपने अच्छी तरह विचार कर लिया है। मैं मानता हूं कि,रूद्र गलत रास्ते पर चल रहा है पर यह काम तो वह वर्षों से कर रहा है। पहले तो कभी आपके मन में ऐसा विचार नहीं आया अब शादी के इतने वर्षों बाद यह विचार आपके मन में कैसे आया यह मेरी समझ से परे है।आप एक बार फिर से सोच लीजिए कहीं ऐसा न हो कि,बाद में आपको अपने फैसले पर अफ़सोस हो" शेखर ने परेशान लहज़े में कहा गार्गी की बात सुनकर शेखर के चेहरे पर चिंता के बादल मंडराने लगे थे।
" मैंने अच्छी तरह सोच विचार करने के बाद ही यह क़दम उठाया है मुझे इस विषय पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता नहीं है जैसा मैंने कहा है वैसा करो" गार्गी ने गम्भीर लहज़े में जवाब दिया।
" भाभी जी मेरे कहने का तात्पर्य यह•••••यहह" शेखर की बात अधूरी रह गई।
उससे पहले ही गार्गी ने गम्भीर मुद्रा में कहा" मुझे लगता है कि, मुझे किसी दूसरे वकील के पास जाना पड़ेगा"
" नहीं भाभी जी ऐसा न कहिए आप बैठिए है आप जैसा चाहतीं हैं मैं उसी तरह सभी पेपर तैयार करवा लूंगा आप निश्चित रहिए और जब-तक काम पूरा नहीं हो जाएगा मैं किसी को कुछ नहीं बताऊंगा" शेखर ने गार्गी से हाथ जोड़कर कहा
" ठीक है पर मैं बैठूंगी नहीं क्योंकि मुझे कुछ और जरूरी काम निपटाने हैं" गार्गी ने गम्भीर लहज़े में कहा और वहां से चलीं गईं।
शेखर आश्चर्य के भाव लिए गार्गी को जाते हुए देखता रहा।
गार्गी कार में आकर जैसे ही बैठी कार बंगले के गेट से बाहर निकल कर सड़क पर दौड़ने लगी।
" छोटी मालकिन अब हवेली चलें" ? मोहन ने पूछा
" नहीं इस पते पर चलो" गार्गी ने पता बताया और मोहन ने कार उस दिशा की ओर मोड़ ली लगभग एक घंटे बाद मोहन ने कार एक शानदार बंगले के कम्पाऊण्ड में लाकर खड़ी की गार्गी कार से उतरकर बंगले के अंदर चली गई।
लगभग दो घंटे बाद गार्गी बाहर आई और गार्गी के कार में बैठते ही फिर से कार सड़क पर दौड़ने लगी इस बार गार्गी ने जो पता बताया उसे पते को सुनकर मोहन ने चौंककर गार्गी को देखा।
गार्गी ने मोहन के चेहरे के भाव को पढ़ लिया और बहुत सपाट स्वर में बोली " तुम्हें चौंकने की जरूरत नहीं है कभी कभी कुछ काम ऐसे भी करने पड़ते हैं जिनको करने की उम्मीद नहीं होती"
थोड़ी देर बाद गार्गी की कार एक बंगले के सामने खड़ी हुई इस बंगले के आसपास कोई और घर नहीं था। गार्गी ने कार से उतर कर बंगले के दरवाजे की कालवेल बजाई थोड़ी देर बाद दरवाजा खुला एक अधेड़ उम्र की औरत गार्गी के सामने खड़ी हुई थी। उसने पूछा "आप कौन हैं किससे मिलना है "?
गार्गी ने गहरी नज़रों से उस औरत को देखते हुए कहा " मैं गार्गी ठाकुर हूं मुझे सुनैना जी से मिलना है"
गार्गी नाम सुनकर जैसे उस औरत को सांप सूंघ गया फिर उसने हकलाते हुए कहा " आप गार्गी ठाकुर हैं अंदर आइए अंदर आइए" उस औरत ने बहुत सम्मान के साथ एक तरफ़ हटते हुए कहा।
" कौन है रधिया काकी"? अंदर से सुनैना की आवाज सुनाई दी तब तक सुनैना की नज़र गार्गी पर पड़ी उसके मुंह से आश्चर्य से निकला " गार्गी तुम यहां मेरे घर में"?
" हां सुनैना मैं यहां मुझे अपने घर में देखकर तुम्हें विश्वास नहीं हो रहा होगा पर मैं सपना नहीं सच्चाई हूं और तुम्हारे सामने खड़ी हुई हूं मुझे बैठने के लिए नहीं कहोगी वैसे ठाकुर साहब ने बहुत आलीशान घर रहने के लिए दिया है" गार्गी ने गहरी नज़रों से देखते हुए मुस्कुरा कर कहा
" हां••• हां क्यों नहीं आओ बैठो" सुनैना ने कहा उसके चेहरे पर अभी भी अविश्वास की परछाई दिखाई दे रही थी।उसकी निगाहें जैसे पूंछ रहीं हों तुम यहां क्यों आई हो।
" सुनैना ज्यादा हैरान होने की जरूरत नहीं है कभी कभी जीवन में कुछ ऐसा घटित हो जाता है जिसके विषय में हमने कभी कल्पना भी नहीं की होती कभी कभी आकाश और धरती भी आपस में मिल जाते हैं।हम यह जानते हैं कि,वह हमारा भ्रम है फिर भी उसे हम हकीक़त मान लेते हैं हम दोनों आकाश और धरती की तरह हैं जो दूर से देखने में एक-दूसरे से मिले हुए लगते हैं परंतु हकीक़त में ऐसा नहीं है मैं यह सब क्यों बता रहीं हूं यह तुम्हारी समझ में नहीं आएगा मैं तुमसे सीधी सीधी बात करती हूं"
सुनैना मैं यह अच्छी तरह जानती हूं कि, तुम्हारा और रूद्र का क्या रिश्ता है उस रिश्ते को हमारा समाज अच्छी नज़रों से नहीं देखता दुनिया की नज़रों में मैं रूद्र की पत्नी हूं और तुम उनकी सहेली पर वास्तव में तुम उनकी पत्नी हो क्योंकि रूद्र के दिल पर तुम्हारा राज है तुम्हारा ऐसा सोचना है जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है।
" तुम यह सब मुझे क्यों बता रही हो यह मुझे पता है तुम मेरे मन में रूद्र और उनकी मां के ख़िलाफ़ ज़हर भरने की कोशिश कर रही हो" सुनैना ने गार्गी को घूरते हुए कहा।
" तुम कुछ नहीं जानती हो मैं तुम्हें रूद्र और उसकी मां का असली चेहरा दिखाना चाहती हूं इसके लिए तुम्हें निमंत्रण देने आई हूं आज से 15 दिन बाद ठाकुर हवेली आ जाना तुम्हें तुम्हारे प्रश्नों के उत्तर मिल जाएंगे की मैं यहां क्यों आई हूं और तुम्हें ठाकुर हवेली में क्यों बुला रही हूं।अब वर्षों से चले आ रहे पर्दे के पीछे खेले जाने वाले नाटक से पर्दा उठने वाला है" गार्गी ने व्यंग्यात्मक मुस्कुराहट के साथ कहा।
" तुम कहना क्या चाहती हो साफ़ साफ़ कहो गोल-मोल बातें मुझे पसंद नहीं है" सुनैना ने चिढ़कर कहा
" मेरी गोल-मोल बातों का अर्थ 15 दिन बाद तुम्हें मिल जाएगा और हां यदि तुम वास्तव में सच जानना चाहतीं हो तो मैं यहां आई थी और मैंने तुम्हें ठाकुर हवेली में बुलाया है यह सब रूद्र से न कहना अगर तुमने ऐसा किया तो मेरा तो कुछ नहीं बिगड़ेगा नुकसान तुम्हारा होगा वह भी बहुत बड़ा जिसकी भरपाई कभी हो नहीं पाएगी।अब फैसला तुम्हें करना है मैं चलती हूं मुझे पूरा विश्वास है कि,हम 15 दिन बाद ठाकुर हवेली में जरूर मिलेंगे" गार्गी ने गम्भीर लहज़े में कहा और सोफे से उठकर खड़ी हो गई।
" गार्गी बैठो एक एक कप चाय हो जाए पता नहीं ऐसा मौका दोबारा मिले या न मिले" सुनैना ने मुस्कुराते हुए कहा
" ठीक है चाय मंगाओ तुम भी क्या याद रखोगी किस रईस से पाला पड़ा था"
गार्गी ने हंसते हुए कहा
तभी रधिया काकी चाय लेकर हाजिर हो गई,चाय देखकर गार्गी और सुनैना दोनों ने हंसते हुए कहा "शैतान का नाम लिया शैतान हाज़िर"
" मैं शैतान नहीं हूं बहूरानियों" रधिया काकी ने हंसते हुए कहा।
चाय पीने के बाद गार्गी चली गई सुनैना सोचने लगी क्या मुझे ठाकुर हवेली जाना चाहिए या नहीं कहीं गार्गी कोई चाल तो नहीं चल रही है।उसे तो मुझसे नफ़रत होनी चाहिए क्योंकि उसका पति मुझे प्यार करता है यह बात वह जानती है फिर वह इतने अच्छे तरीके से कैसे बात कर सकती है।
" क्या सोच रही हो बहूरानी"? रधिया ने पूछा
" काकी मैं गार्गी के विषय में सोच रही हूं वह यहां क्यों आई थी मुझे ठाकुर हवेली क्यों आने के लिए कह रही है कहीं ऐसा तो नहीं कि वह मुझे रूद्र की नज़रों में गिराना चाहती हो।अगर ऐसा हुआ तो मेरा क्या होगा आप तो रूद्र को अच्छी तरह से जानती हैं अगर वह किसी से नाराज़ हो जाता है तो फिर उसकी तरफ़ मुड़कर नहीं देखता यही सोचकर मेरा मन डर रहा है मैं कोई निर्णय नहीं ले पा रही हूं" सुनैना ने परेशान होते हुए कहा।
" बहूरानी छोटा मुंह बड़ी बात पर मैंने भी दुनिया देखी है मुझे तो गार्गी बहूरानी की बातों से चालाकी का आभास नहीं हो रहा था। मेरे विचार से आपको वहां जाना चाहिए" रधिया काकी ने समझाते हुए कहा।
" ठीक है काकी मैं जाऊंगी अब जो होगा देखा जायेगा शायद इसमें भी कोई अच्छाई छिपी हो" सुनैना ने लम्बी सांस लेकर कहा।
दूसरी तरफ गार्गी जब ठाकुर हवेली पहुंची तो पार्वती जी और रूद्रप्रताप हाल में बैठे हुई चाय पी रहे थे। गार्गी को देखते ही पार्वती जी ने गुस्से में पूछा " बिना बताए कहां गई थी सुबह की निकली हुई शाम को घर आ रही हो "??
" मां जी मैं आपकी दूसरी बहू से मिलने गई थी आपके बेटे की दूसरी पत्नी से" गार्गी ने मुस्कुराते हुए कहा
" तुम्हें क्या हो गया है बहू तुम किसी भी बात का सीधे-सीधे जवाब नहीं दे रही हो पहले तो तुम ऐसा कभी नहीं करतीं थीं अब तुम्हें क्या हो गया है"? पार्वती जी ने चिढ़ते हुए कहा
" यह सब तो मैंने आपसे ही सीखा है मां जी" गार्गी कहते हुए फिर मुस्कुराई।
ठाकुर रूद्रप्रताप ने गुस्से में घूरते हुए गार्गी को देखा "ऐसे क्यों देख रहें हैं ठाकुर साहब कहीं आपको यह डर तो नहीं है कि यह राज बुआ जी जान जाएंगी" गार्गी ने मुस्कुराते हुए पूछा
"मुझे तो लगता है यह हवेली दफ़न हुए राज का मकबरा बनकर रह गई है। कहां यह हवेली खुली हुई किताब थी जिसमें प्रेम, त्याग,करूणा, परोपकार, सत्य, अहिंसा, ईमानदारी, और अपनेपन के गीत लिखे हुए थे जिसे हर व्यक्ति पढ़ सकता था। लेकिन अब यह षड्यंत्रों का अड्डा बन गई है मेरा यहां दम घुटने लगा है" लक्ष्मी ने गुस्से में कठोरता से पार्वती और रूद्र को देखते हुए कहा।
तभी मोहन ने आकर बताया कि, पार्वती के भाई और पिता आए हुए हैं हो रही बात वही रूक गई।
" पार्वती के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई वह आगे बढ़कर अपने पिता और भाई के स्वागत करने के लिए खड़े हुई।
तभी वहां पार्वती के पिता भवानी ठाकुर और भाई कुंदन ठाकुर ने प्रेवश किया••••• क्रमशः

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