तिमिर ये छट रहा देखो
रात आई दिये वाली...

रात अमावस की भी आज
लग रही है पूनम वाली...

चारों ओर हैं खुशियां
मन रही आज दिवाली...

फिर भी है कोई तो आज भी
घर जिसका है खाली...

फिर कैसे मैं कह दूं
रात है ये खुशियों वाली...

जब तक कि हर घर में
मने ना आज दीवाली...

भरे हैं लाख ये बाजार मगर 
फिर भी हैं घर कई खाली...

कैसे हर कोई मनाये
देखो आज दिवाली...

कमर जब तोड़ ही दी है 
महगाई ने सारी...

कोई उड़ाता है नोटों को
धुआं धुआं करके...

किसी के घर के चूल्हे में
नहीं है आज आग भी जलने वाली...

काश कुछ तो ऐसा चमत्कार हो जाए
हर कोई देखो खुशियां मना पाए...

हर घर में हो रौनक 
हर कोई खुश हो पाए...

हर किसी के दुख को 
हर कोई समझ पाए...

दिए की रौशनी से 
ह्रदय का भी अंधकार मिट जाए...

फिर तो हर रोज दिवाली
और हर घर में दिवाली...

कविता गौतम...✍️
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