हमें लगता था कि हमारे माता -पिता कम पढ़े लिखे हैं वे आज के जमाने से पिछड़े हुए हैं। अब जब हम लोग उम्र के उस पड़ाव पर हैं तो लगता है कि हमारे बच्चे ज़माने के हिसाब से चल रहे हैं और हम लोग उनकी अपेक्षा कम पढ़े लिखे हैं। हमारे विचारों और सोचने समझने के नजरिये में भी बहुत फर्क आ चुका है। इसे ही पीढ़ी का अंतराल कहते हैं।सच तो यह है कि पीढ़ी के अंतराल की प्रक्रिया चलती रहती है।दो पीढ़ियों के बीच में बहुत अंतर आ जाता है। तबतक बहुत से परिवर्तन भी हो जाते हैं जिनका असर इन पीढ़ियों पर पड़ता है। जहाँ पुरानी पीढ़ी जल्दी सोने और जल्दी  सोकर उठने में यकीन रखती है वही युवा पीढ़ी देर रात तक जगना और देर से सोकर उठती है। पुरानी पीढ़ी संचय , सादगी , के साथ रहती है।बहुत भागदौड़ नहीं कर पाती। इस  आधुनिक परिवेश को आश्चर्य से देखते हैं। ज़माना बदल गया है , ज़माना बदल रहा है  ये बाते बचपन से सुनते आ रही हूं और आज भी सुन रही हूँ। हमारे बच्चे भी यही सुन रहे हैं उनके बच्चे भी यही सुनेंगे। पीढ़ी का अंतर सदैव बना रहेगा। हमलोग कहते थे हमारे बच्चे हमलोगों से बहुत तेज़ हैं, मेरी बेटी कहती है आजकल के बच्चे हमसे बहुत तेज हैं । हमें जो बातें अब पता चलीं वे अभी से जानते हैं। पहले हम जो हमारे माता पिता कहते थे उन्हें पत्थर की लकीर समझ कर मान लेते थे किन्तु आजकल के बच्चे अपने दिमाग का प्रयोग करते हैं और सही गलत में फर्क करना जानते हैं। मैं ये नहीं कह रही हमारे माँ बाप हमें कुछ गलत सिखाना चाहते थे या हम अपने बच्चों को कुछ गलत करने को कहते हैं। कुछ बातें हमें ठीक लगती हैं लेकिन बच्चों का अपना देखने समझने का नज़रिया होता है।
पीढ़ी अंतराल का रिश्तों पर बहुत असर पड़ा है। भावनाओं में कुछ कमी आई है। इसका प्रमुख कारण तकनीकी क्रान्ति है। ये जहाँ हमें  विकसित देश के नागरिक की श्रेणी में ले आ रही हैं वहीं अपनों स दूर कर रही हैं।बचपन से बच्चे एकल परिवार मे रहने लगे हैं। बुजुर्ग अपने आप को उपेक्षित महसूस करते हैं।इन पीढ़ियों में विचारात्मक टकराव भी है।
बेटा शहर छोड़ कर गांव नहीं जा सकता और माँ-बाप गाँव छोड़कर शहर नहीं आ सकते।
सच तो यह है कि पीढ़ी अंतराल हमेशा चलता रहेगा क्योंकि परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है सृष्टि का परिवर्तन विचारों का परिवर्तन सभ्यता का परिवर्तन और संस्कृति का परिवर्तन।
स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह'