एक अजीब सी घुटन बन गयी ज़िंदगी। पता नहीं जीने के लिए कट रही या काटने के लिए जी रहे हैं। मेरी मौजूदगी में आज जो घुटन महसूस कर रहे हो तुम, देखना कल मेरी परछाई को भी ढूंढा करोगे। घुटन सी होने लगी है इश्क जताते हुए, मैं खुद से रूठ गया हूं तुम्हें मनाते हुए। हक इतना ही जताओ जनाब जितना की जायज़ लगे, रिश्ता सात फेरों का हो या प्यार का बस घुटन न लगे। हर कोई परेशान है मेरे कम बोलने से और मैं परेशान हूं मेरे अंदर के शोर से, पहले चुभा बहुत अब आदत सी हो गई, दर्द तो पहले से था अब इबादत सी हो गई, घुटन सी होती है अब तो जिंदगी जीने में भी, तकलीफ़ ये कम नहीं होगी अब मरने से भी। जिस हाल में मरने की दुआ करते हैं लोग मैंने उस हाल में भी जीने की कसम खाई है। ज़वाब हर बात का दिया जा सकता है मगर जो रिश्तों की एहमियत ना समझ पाया वो शब्दों को क्या समझेगा। मैं अपने शब्दों को बोल देना चाहती हूं, अपने हर किस्से को खोल देना चाहतीं हूं। पर ना जाने कैसी चुभन होती है हर रोज़ लड़ने में, कभी खुद से तो कभी अपने खुदा से। घुटन इतनी है कि अब चुप रह नहीं सकती, मजबूर इतनी हूं कि सब कुछ कह नहीं सकती.......
"उदासी... बेचैनी...घुटन... तनहाई", उफ्फ ये ख्वाहिशें मुझे कहां ले आई।

प्रिया धामा