घूरती निगाहें पूछती है कभी-कभी,
मैं भी तो इंसान हूं जिंदगी क्या मेरी नहीं, गलत रिश्तो की तारे जब जुड़ जाती है, सारा दोष लड़की के मथे क्यो जड़ दी जाती है, कभी खुद को
अबला और असहाय महसूस क्यों कराई जाती है, मुझ में ही कमियां क्यों बताई जाती है खुद के लिए जीना क्या जिंदगी नहीं है,
हमसफर के बिना क्या जिंदगी नहीं है, कुछ निगाहें दया और बेचारी सी
देखते हैं कुछ हबस के निगाहों से,
खुद के लिए जीना क्या जिंदगी नहीं है, जुल्म की आवाज उठाना अपराध हो गया घुट घुट कर सिसकी की आवाजें ना जाने कितने घरों में,
बंद कमरे के अंदर छिपे होगी
जुल्म की आवाज उठाने पर
अपने लोग भी बेगाने हो गए
क्या गुनाह था मेरा लोग कतराने लग गए मैं स्वतंत्र हूं फिक्र नहीं है मुझे,
घुट-घुट की जिंदगी से अच्छा है,
अकेले और आजादी की जिंदगी,
मैं खुश हूं लोगों की परवाह नहीं है
दुनिया समाज क्या सोचे जिंदगी के पथ पर कभी डगमगाए नहीं आत्मविश्वास मेरा बनाए रखना
प्रभु जिंदगी मेरा खुशहाल बनाए रखना आजाद ख्यालों की मैं
जुल्म बर्दाश्त नहीं।
सपना कुमारी जहानाबाद बिहार

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