बिखर जाते है जब ख़्वाब दिल के तो शीशे सा दिल टूट जाता।
इस  झूठे  फ़रेबी  जहां  में  रिश्ता  दौलत  से  है  छूट  जाता।

छोड़ के आदमी आदमी को लगा फूलों से करने मुहब्बत।
जो ग़ैरों के ख़ातिर महकता ज़ुदा डाली से हो टूट जाता।

पूरी करता मुरादें वो सबकी आसमाँ में चमकता सितारा।
करता सबकी  दुआ-ए- क़ुबूलें करके नेकी वो खुद टूट जाता।

टूटता तारा देखा ज़ो हमने बस इतनी सी मन्नत है  मांगी।
रहे क़ायम भरोसा जहां में बिन भरोसा के जग रूठ जाता।

इक  मासूम  तारा  गगन  का  टूटकर के कहीं  खो गया है।
"अक्षरा"  ख़्वाब  करके मुकम्मल मुस्कराकर भी वो टूट जाता।

शीला द्विवेदी "अक्षरा"
उत्तर प्रदेश "उरई"