आसमाँ से जमीं ने है पूछा तेरा दीदार कैसे करूं मैं।
बनके बारिस की बूँदों संग बरसू या क्षितिज पार उड़ के चलूं मैं।

गहरी ख़ामोशियों का है साया और हवाओं का रुख भी है बदला।
चाँद-तारों के संग-संग मैं भी बनके फूलों का शबनम झरूं मैं।

ये गलियां मुहब्बत से सूनी नफ़रतों की लगी है क़तारें।
कर दे मौला मेरे रहनुमाई इश्क का दरिया बनके बहूं मैं।

चाँद तारों से शोभित था अम्बर कभी गुलजार करती थी गलियां।
महफ़िलें भी हुई अब तो सूनी सफ़र मीलों के तन्हां करूं मैं।

जिंदगी में सुकूँ खोजते है पर मुकम्मल हुआ न जहां में।
ढूंढूं यादों की वो परछाई जन्मों-जन्मों संग जिसके चलूं मैं।

शीला द्विवेदी "अक्षरा"
उत्तर प्रदेश "उरई"