एक देश में स्थित भारतीय दूतावास में काम करने वाले कर्मचारी राजदूत मैडम की तारीफ करते थकते नहीं थे। इतनी बङी अधिकारी और कोई घमंड ही नहीं। रोज सभी छोटे और बङे का हालचाल पूंछतीं हैं । सभी को अपने परिवार का सदस्य ही समझतीं।अंजना आई एफ एस मेहनती भी बहुत थीं। सबसे बङी बात, किसी भी भारतीय की समस्या देखकर विकल हो जातीं। वास्तव में यही उनकी ड्यूटी थी। परदेश में आये भारतीयों के वीजा पर नजर रखना, किसी का वीजा समाप्त होने बाला है तो उसे पहले ही सूचना देना, यदि जरूरत हो तो वीजा एक्सटेंड कराना, ये सारे काम इतनी अच्छी तरह हो रहे थे कि भारतीय प्रवासियों का उनपर स्वाभाविक ही स्नेह हो जाता।
अंजना पच्चीस साल की युवती थी। उसके विषय में कई बातें ज्यादा प्रचलित थीं। कोई उन्हें मजदूर की बेटी बताता जिसका पिता बहुत समय से गायब बताया जाता। कोई कहता कि सिविल सर्विसेज की परीक्षा में मैडम ने टाप रैंक हासिल की थी। पर दूसरे अभ्यर्थियों की तरह आई ए एस या आई आर एस जोइन न कर मैडम ने आई एफ एस (भारतीय विदेश सेवा) को चुना। कहा यह भी जाता था कि मैडम की माॅ उन्हें विदेश भेजने के लिये कतई तैयार न थीं। आखिर जिस स्त्री का पति विदेश से वापस ही न आया हो, वह भला अपनी बेटी को कैसे विदेश जाने देगी। पर मैडम की जिद थी और अंत में माॅ को झुकना पङा। पर इन सभी बातों में कितनी सच्चाई है, इसका कोई भी प्रमाण किसी के पास न था। एक सच्चाई कि अंजना जमीन से जुङी युवती हैं, इसपर किसी को भी एतराज न था।
दोपहर के वक्त भारतीय दूतावास के कर्मचारी कैंटीन में भोजन कर रहे थे। अंजना भी वहीं पहुंच गयी। वैसे इस तरह की कल्पना करना भी आसान काम नहीं है। पर जब से अंजना राजदूत बनकर आयीं हैं , उनका सभी के साथ मिलकर खाना खाना आम बात है।
" गुड आफ्टरनून मैडम। आइये...। बैठिये।"
अंजना चालीस वर्षीय आराधना के पास बैठ गयीं। खुद के बैग में से लंच बाक्स निकाला। कैंटीन बाले को जितने लोग बैठे हैं, उतनी चाय का आर्डर दिया। और सभी खाना खाने लगे।
" मैडम। एक बात पूछनी थी। बताते हैं कि आपने आई ए एस जोइन नहीं किया था। " सोहन ने पूछ लिया।
" बिलकुल सही है।"
सभी की निगाहें प्रश्नवाचक भूमिका में थीं। पर अंजना शांत रहीं। जैसे कुछ कहना चाहती हो पर कह नहीं रही। कई बार मन के भाव चेहरे पर दिखने लगते हैं।
" आज आप सभी के साथ एक जरूरी मीटिंग लेना चाहती हूं। कृपया सभी भोजन करके मेरे कैबिन में आ जायें। "
अंजना ने खाना खत्म करते ही कुछ इस तरह कहा कि जैसे आदेश दे रही हो। सभी को थोड़ा अटपटा तो लगा। पर आखिर अंजना एक अधिकारी भी है। कर्मचारियों को हर हाल में अपने अधिकारी के चिंता के कारण को जानना चाहिये। वह भी अंजना जैसी व्यवहारकुशल अधिकारी को कोई मना भी नहीं करेगा।
कैविन में अंजना अपनी कुर्सी पर बैठी थी। सामने बङी सी मेज थी। चैंबर में गद्देदार कुर्सियां व सोफे बिछे थे। सभी अपने लिये जगह तलाश बैठ गये। मीटिंग शुरू हुई।
" मैं देख रही हूँ कि कई भारतीय जो तीन या चार साल के जॉब वीजा पर भारत से आये थे, कभी वापस गये ही नहीं। उनका पूरा डिटेल देखना था। आखिर उन्होंने अपना वीजा किस आधार पर एक्सटेंड कराया। उनकी जॉब की वर्तमान स्थिति अब कैसी है।"
चैंबर में चुप्पी छा गयी। शायद इसकी पूरी डिटेल किसी के पास न थी। इस डिटेल की जरूरत क्या है। यही बात सभी के मन में आ रही थी।
" आराधना जी। आप शायद यहाॅ सबसे सीनियर हैं। कई सालों से यहाॅ काम कर रही हैं। आपको कुछ तो पता होगा। "
मैडम ने इस बार आराधना जी की तरफ इशारा कर दिया। आराधना को भी भला पूरी बात क्या मालूम थी। पर जब मैडम ने पूछा है तो कुछ तो बताना होगा।
" मैडम जी। जिनको यहाॅ का काम पसंद आ गया होगा, वह वापस नहीं गये होंगें। उनकी एप्लीकेशन भी आयी होंगीं। और कई लोगों ने तो यहाॅ की नागरिकता ही ले ली है। इस देश की सरकार भी नागरिकता देने में बहुत उदार है। उनकी सूचना जरूर दस्तावेजों में होगी।"
" सारी सूचनाओं को इकट्ठा करने का वक्त आ गया है। हमारे भारतीय मुसीबत में हैं। हमें उन्हें बचाना है। पर पूरी तैयारी के साथ। "
मैडम की बात किसी की समझ में तो नहीं आयी। पर अंजना जैसी अधिकारी को कोई मना भी नहीं कर सकता था। सभी अपने स्तर से लग गये। दूतावास में रोजमर्रा के काम भी कम न थे। पर व्यौरा तैयार करने में भी कौताही नहीं थी। फिर भी एक महीने से कुछ ज्यादा समय हो गया। ज्यादातर न लौटने बाले भारतीयों की इस देश के नागरिक बन जाने की सूचना थी।
राजदूत अंजना ने पूरी डिटेल के साथ सरकार से पत्र व्यवहार करना शुरू कर दिया। आखिर तीन या चार साल के लिये मजदूरी करने आये इतने लोग यहाॅ के नागरिक बन गये। तो उनकी स्थिति में तो बहुत सुधार हुआ होगा। पर कहीं भी कोई उद्योगपति भारतीय नहीं दिख रहा। कंपनियों, खदानों और फार्म हाउसों में मजदूरी करते जरूर भारतीय दिख रहे हैं।
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अंजना आफिस का काम पूरा कर आवास के लिये निकल ली। रोज की तरह अपने सभी अधीनस्थों से मिलकर जैसे ही गाङी में बैठने जा रही थी, कुछ नकाबपोशों ने उसपर हमला कर दिया। वह तो दूतावास की सुरक्षा में तैनात भारतीय सेना का जवान रामसिंह की नजर पङ गयी। दूतावास की सुरक्षा के लिये भारत सरकार ने सेना के जवान भेज रखे थे। अंजना को बचाते हुए उसने दोनों हमलावरों को ढेर कर दिया। पर खुद भी बुरी तरह घायल हो गया।
पूरे तीन दिन बाद रामसिंह को होश आया। होश में आने पर उसने अपने बहुत नजदीक अंजना को बैठे देखा। एक अदने से सिपाही की देखभाल में इतनी बङी अधिकारी लगी है, विश्वास भी करना कठिन है।
" मैडम। आप मेरी देखभाल कर रही हैं।"
" इसमें क्या बात है। आखिर आपने ही तो मेरी जान बचाई है। अभी आप आराम करें।"
रामसिंह अंजना को देखता रहा। अंजना उसकी हर जरूरत को देख रही थी। रामसिंह के मन में भावनाओं का ज्वार आ रहा था। पर उन्हें वह काबू किये था। मन में आयी हर बात कही नहीं जाती। पर शायद एक ज्वार अंजना के मन समुद्र में भी आ रहा था। रामसिंह भले ही अपने ज्वार को रोकने में कामयाब रहा पर लङकियों के लङकों से किसी भी बात में कमजोर न होने का दावा करने बाली अंजना आज कमजोर पङ गयी। स्त्रियाँ भले ही शक्ति का पर्याय हों, पर सच्चाई है कि दिल भी जल्दी हार जाती हैं। और दिल लुटाने बाली एक स्त्री होती है न कि कोई अधिकारी।
" मेरा जीवन आपकी ही देन है। मेने निश्चय किया था कि जब तक अपना उद्देश्य न पा लूं तब तक विवाह के बारे में सोचूंगी भी नहीं। पर आज मेरा दिल मेरे संकल्प पर भारी हो रहा है। यह क्या जादू है। मुझे कुछ नहीं पता।कहीं मैं कमजोर तो नहीं हो रही।"
रामसिंह के हाथों में अंजना का हाथ अनायास आ गया। रामसिंह उन हाथों को छुङाना चाहता था। कहना चाहता था." मैडम। यह क्या। मैं सेना का अदना सा जवान। आप इतनी बङी अधिकारी ।मुझसे आपका कैसा मेल। "
पर अब मन के ज्वार को रोक पाने में रामसिंह भी असमर्थ था। फिर कमरे में एक शांति छा गयी। ऊंच और नीच की दीवार को ढहाकर आई एफ एस अधिकारी अंजना व सेना के जवान रामसिंह के मध्य इश्क की धारा बहने लगी। इश्क तो हर मुश्किल का हल है। देखना है कि इश्क की नौका पर सवार अंजना अपना लक्ष्य कैसे पायेगी।
क्रमशः अगले भाग में.....
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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