लॉक डाउन की बात बताऊं,सुन लो सखी हमारी।
मदद कराना पतिदेव से,हमको पड़ गयो भारी।

बाजार से लेकर ऑफिस, विद्यालय जब सारे हो गए बन्द।
अलसाये पतिदेव रहें ज्यों,जलता दीपक मन्द।

बाई ने जब छुट्टी कर दी, तब आई थी आफत भारी।
खाना,बर्तन,झाड़ू,पोछा,  सब  हमाई  जिम्मेदारी।

थक कर हो जाती चूर,काम मैं करते-करते हारी।
ऑनलाइन काव्य पाठ मेरा, साथ में चलता बारी बारी।

करना था काव्य पाठ मुझे,तो एक उपाय है सुझा।
क्या आज करोगे मदद मेरी,पतिदेव से मैंने पूछा।

हँस कर बोले तुरत, और फ़रमाओ जाने मन।
तुम्हरी सेवा करने को, तैयार रहे हरदम मेरा मन।

ज्यादा कुछ नही करना तुमको, रसोई में मदद करादो।
दूध गर्म कर आटा गूंथ कर,  दाल भात पका दो।

सीटी मार कर थका कुकर,सब्जी भी जल गई सारी।
बगल वाले कमरे में पतिदेव के, चल रहे खर्राटे भारी।

खत्म हुआ काव्य पाठ मेरा, झटपट किचिन में आई।
ऐसी हालत हुई किचिन की, मनहु सुनामी  आई।

रख माथे पर हाथ सखी, मैं बहुतई पछताई।
कबहुँ न मागें अब मदद पति से, हमने सौगन्ध ये खाई।।

शीला द्विवेदी "अक्षरा"
उत्तर प्रदेश "उरई"