अभी तक बाहनपुर के बाशिंदे अंग्रेजी हुकूमत की गुलामी करते आये हैं। इसका उन्हें फायदा भी मिलता रहा है। बाहनपुर के विकास पर दूसरी रियासतों से ज्यादा ध्यान दिया गया है। बाहनपुर के पढे लिखे अनेकों युवा अंग्रेजी हुकूमत में नौकरी कर रहे थे। बाहनपुर के अनेकों लड़के अंग्रेजी फौज का हिस्सा थे। इन कारणों से अंग्रेजी हुकूमत के विरोध का कोई प्रश्न न था। पेट मस्तिष्क और हृदय पर हावी हो रहा था।
पर स्थितियां बदलते कभी देर नहीं लगती। अनेकों बार सदियों से सो रहे अचानक जग जाते हैं। अनेकों बार ऐसा अप्रत्याशित हो जाता है जिसकी कल्पना भी कोई नहीं कर सकता।
बाहनपुर में महीनों से कुछ स्त्रियां नाटकों के माध्यम से बाहनपुर की प्रजा का जमीर जगा रही थी। संभव है कि अनेकों इन नाटिकाओं का अर्थ समझ चुके हों। उनके मन में अपराध बोध की आग सुलगने लगी हो। संभव है कि उन स्त्रियों के हिमायती इसी रियायत में कहीं छिपे हों। संभव है कि इसके पीछे कुछ गहरा राज हो।
जनरल श्रेकल को इस समय उन्हीं स्त्रियों की तलाश थी। यदि एक बार वे पकड़ में आ गयीं तो फिर इस साजिश में सम्मिलित सभी बेनकाब हो जायेंगें। अंग्रेजी हुकूमत की भलाई के लिये अनेकों कदम उठाने होते हैं। जहाँ एक तरफ गुलामी का मुल्य बाहनपुर के बाशिंदों को विभिन्न सुविधाओं के रूप में मिल रहा था। वहीं यह संदेश देना भी आवश्यक है कि अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ सर उठाने का क्या परिणाम होता है।
ज्योति अपनी साथी महिलाओं के साथ निकल तो गयी पर आज शायद ईश्वर उनके पूरी तरह पक्ष में न थे। अथवा यह भी संभव है कि ईश्वर उनके पक्ष में ही हों। शायद जिस कार्य को पूर्ण करने की लालसा से वह बाहनपुर आयी थी, उसे बिना पूर्ण किये उसका बाहनपुर से गमन ईश्वर को मंजूर न था।
कुछ ही दूर चलने पर ज्योति का अश्व एक बड़े पत्थर से टकराकर अपने पैर तुड़बा बैठा। बेजुबान प्राणी दर्द से चीखने लगा। ज्योति अश्व से गिर गयी। उनकी संगिनी स्त्रियां आगे निकल गयीं। शायद किसी को अनुमान न होगा कि ज्योति गिर चुकी है। यह भी संभव है कि किसी को पता भी चल चुका हो। ऐसी स्थिति में भी अपने पूर्व वचन के कारण कोई न रुकी हों। वैसे भी यह एक रण है जिसमें अनेकों बार ऐसी स्थिति आ सकती थी। मुख्य ध्यैय अपने मिशन को आगे बढाना है। किसी एक की रक्षा करना नहीं। ऐसे में सभी बराबर हैं। न स्वामिनी और सेविका का भेद है और न ही राजकुमारी तथा प्रजा के मध्य कोई अंतर।
माया जो ज्योति की प्रगाढ़ सखी थी, कुछ ही देर में अपना वचन भूल गयी। अपनी राजकुमारी को बचाने की इच्छा से वापस आने लगी। दोनों एक ही अश्व पर अपने रियासत की तरफ निकल सकती थीं। पर तब तक ज्योति अंग्रेजी सेना के मध्य अकेली युद्ध कर रही थी। अकेली ही अनेकों पर भारी पड़ रही थी। अब तो माया भी आ गयी। दोनों अपने प्राणों को दांव पर लगाकर रणचंडी बन रही थी।
एक अकेली माता दुर्गा अनेकों निशाचरों का वध करने में समर्थ हैं। पर लगता है कि आज माता दुर्गा कुछ अलग ही चाहती हैं। पचासों सैनिकों को मौत के घाट उतारने के बाद आखिर दोनों अंग्रेजी सेना के कब्जे में आ गयीं।
जनरल श्रेकल के आदेश पर ज्योति और माया को जंजीरों से बांधकर बाहनपुर की गलियों में घुमाया जा रहा था। चाबुक की मार से उनके बदन से रक्त की बूंदे टपक रही थीं। हालांकि बाहनपुर में ज्यादातर तो कायर ही थे। पर आज उन रक्त बूंदों को देख कुछ के मन में कुछ अलग ही भाव जन्म ले रहे थे। अंग्रेजी हुकूमत की ज्यादती भले ही कायरों को और कायर बना रही थी। पर कुछ के मन में वगावत का बीज बो रही थी।
हे प्रभु। इतना अत्याचार। जिन स्त्रियों को हम माता मानकर पूजते हैं, आज उन्हीं माता का सरेआम अपमान। सत्य ही है कि जिनके मन में ही पशुता बसी हो, उन्हें इन सबसे क्या प्रयोजन।
अरे हम मूर्ख हैं। जो अंग्रेज़ी हुकूमत की गुलामी में अपना जीवन जीते आये। हमसे तो श्रेष्ठ ये स्त्रियाॅ हैं जो मात्रभूमि के लिये अपने प्राण भी अर्पण करने को उद्यत हैं। इनको हमने नाचने गाने बाली समझा। पर ये तो देशप्रेम का अलख जगाने बाली देवियाँ हैं। इतने कष्ट के बाद भी इनके चेहरे पर कोई शिकन दिखाई नहीं देती।
अरे बाहनपुर के वीर योद्धाओं। क्या आप सभी के समक्ष इन स्त्रियों का इसी तरह अनादर होता रहेगा। फिर धिक्कार है आपके शस्त्र ज्ञान को।
भले ही ऐसी बातें अनेकों के मन में उठ रही हों। पर आगे बढकर प्रतिरोध करने में सभी अक्षम थे। अनेकों वीरों के हाथ बार बार तलवार तक जाते पर अचानक तलवार की मूंठ से पकड़ ढीली पड़ जाती। गुलामी जल्द पीछा न छोड़ती।
पांचों पांडव महावीर थे। अर्जुन तो पूरी सेना को ही रोक सकने में सक्षम थे। उन्होंने ऐसा सिद्ध भी किया। पर जब पांडव जूए में हारकर कौरवों के गुलाम बन गये तो अपनी सारी शक्ति खो बैठे। दस हजार हाथियों के बल के बराबर बली भीम और संसार के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन भी अपनी भार्या द्रोपदी के अपमान को रोक न सके।
अनेकों धर्म ज्ञानी, परमवीर जो मन ही मन कुलवधू के अपमान की निंदा कर रहे थे, गुलामी की बेड़ियों में जकड़े नयन नीचे कर बैठे रहे। और विरोध किया तो किसने। तीसरे नंबर के कौरव विकर्ण ने। क्योंकि विकर्ण गुलाम न था।
गुलामी वास्तव में एक मानसिक अवस्था होती है। जब शक्तिशाली भी अपनी शक्ति को भूल जाये, जब सदाचारी भी कदाचार को देख कुछ भी कहने में अक्षम हो जाये तब वही अवस्था गुलामी कहलाती है।
दो भारत ललनाओं के अपमान को देख अभी भी ज्यादातर बाहनपुर वासी इंतजार कर रहे थे कि कोई श्री कृष्ण बन आ जाये। और दुष्टों को दुष्टता का दंड दे जाये। आत्मशक्ति से हीन इस तथ्य को समझने में भी सक्षम न थे कि प्रत्येक मानव ईश्वर की लगभग छह से सात कलाओं के साथ जन्म लेता है। प्रत्येक मनुष्य कुछ न कुछ ईश्वरीय शक्ति से युक्त होता है।
जिसकी उम्मीद न थी, वह हो गया। कायरों के मध्य कोई निडर पैदा हो गया। कोई सोता हुआ जग गया। कोई नकाबधारी ज्योति और माया को अंग्रेजी सेना से छुड़ा कर ले गया। ज्योति और माया को आजाद कराने बाला कोई बाहनपुर का ही नागरिक हो सकता है, इस बात पर विश्वास करना भी कठिन है। अभी तो जनरल श्रेकल को लगता है कि कोई इन स्त्रियों का साथी ही उन्हें छुड़ा कर ले गया है। पर संभव है कि वह कोई अंग्रेजी हुकूमत का गुलाम ही हो। संभव है कि अभी भी उसके इस अप्रत्याशित व्यवहार का कारण बस मन में उठा प्रेम ही हो। प्रेम किसी को भी बदल सकता है। कायर को शक्तिशाली बना सकता है।
हालांकि किसी सुंदर स्त्री को देख जो प्रेम मन में जगता है, अक्सर वह वासना ही होती है। सच्चा प्रेम सुंदरता से नहीं अपितु गुणों से होता है। वैसे भी स्त्री और पुरुष के मध्य का प्रेम बहुत निम्न कोटि का कहा जाता है। सच्चा प्रेम तो कर्तव्यों से होता है। जिस प्रेम से अभिभूत कोई भी बांकुरा देश के लिये खुशी खुशी अपने प्राणों को अर्पित कर देता है।
एक दूसरी सच्चाई यह भी है कि ऊपरी मंजिल तक पहुंचने के लिये सीढियों पर धीरे धीरे चढा जाता है। आज जिसे ज्योति की सुंदरता से प्रेम हुआ है, वह ज्योति के गुणों से भी प्रेम कर देशप्रेम का भी आदर्श बन सकता है।
क्रमशः अगले भाग में

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