दीना ओ दीना ।।
मैने  पास ही सर्वेंट क्वार्टर में रहने वाले दीना को आवाज लगाई ,वो कल घर में काम करने नहीं आया था ।
कल तो उनका त्योहार था कर्मा ,शायद  इसी कारण नहीं आया होगा , यही सोच कर रह गई थी मैं ।लेकिन आज भी देर हो रही थी ,एक बार निकल गई संस्थान तो फिर दोपहर को ही लंच टाइम में आना होगा ।
दीना वहीं स्थानीय आदिवासी जाति से ताल्लुक रखता था।वह बहुत मेहनती और ईमानदार था।

दीना के घर पहुंचते उसने देखा दीना चारपाई पर बैठा था,चाय का पानी चढ़ा  रखा था।
उसने नीना को देखते ही कहा ,अरे डॉक्टरनी दीदी , काहे को तकलीफ की।
हमरा सर तनी भारी था,चाय पी  के आते।

तुम चाय पियोगे ,लेकिन मैं तो ड्यूटी पर लेट हो जाऊंगी _नीना ने गुस्से से कहा।

अरे ... बाबा, मां, ए दीपा देख डॉक्टरनी दीदी आई हैं।

दीदी बस हम आते हैं। आप घर पहुंचिए।_दीना ने कहा।
जल्दी आओ , चाय मैं पिला दूंगी_नीना ने कहा।

वो जल्दी ही आ गया ,मैने इतने दिनों से कभी उसके बारे में नहीं पूछा था ।देर हो गई थी इसलिए आज  मैंने ड्यूटी जाना कैंसल कर दिया।

मैने अपने और उसके लिए चाय बनाई ,और कहा आराम से काम करो,आज मैं नहीं जा रही ,अब देर हो गई ,हॉस्पिटल से बुलावा आएगा तो चली जाऊंगी।
चाय पीते पीते मैने उससे बात करना शुरू किया।
दीना तुम्हारे घर में कौन कौन है? 
वह बहुत उल्लासित हो गया ,पहली बार मैने उससे उसके परिवार के बारे में पूछा।

वह बताने लगा ,हमर बाबा , माय और एगो बहिन है,दीपा।
दीपा को तुम बहुत प्यार करते हो_नीना ने पूछा।
हां दीदी , उ न हमर जान से बढ़के है।
कॉलेज में पढ़ता है_दीना अपनी बहन के बारे में बता रहा था।
किस कॉलेज में ?_,मैने पूछा ।
गोस्सनर कॉलेज में_दीना ने बताया।
ये तो यहां से दूर है , यहीं आस पास विमेंस कॉलेज,रांची कॉलेज या जेवियर कॉलेज में करा देते।
उ न हमारा जान पहचान के एक सर इधर से ही जाते हैं वहां पढ़ाने ,इसी के लिए वहीं एडमिशन करा दिए।

चाय खत्म हो चुकी थी।दीना अपना काम करने लगा।मैं भी इधर उधर पड़े कपड़ों को समेटने में जुट गई।
अर्चना ने निरंजन के बारे में काफी सूचना दे दी थी।

अब मैं कभी कभी शाम को दीना के घर चली जाती ,उसके माता पिता और बहन का हाल खबर लेने।
पियूष से भी मिलना थोड़ा कम था,वो अपने काम में बहुत व्यस्त था,उसने हॉस्पिटल छोड़ अपना प्राइवेट क्लिनिक खोल लिया था ।

ज्यादातर उसका घर खुला ही रहता,और चाय ,खाना खुद ही पकाता।
मैं जब जाती तो वह जरूर चाय पी कर ही आने देता।

एक दिन शाम को मैं उसके घर दीपा के लिए सूट  ले कर गई।
दीना खूब खुश हुआ,उसने दीपा से कहा ,देख दीदी हमलोग का कितना खयाल रखती हैं।
देखा दीदी ,दीपा कितनी खुश है,जा पहन के दिखा दीदी को।
मैने कहा _हां दीपा दिखाओ ,कैसी लग रही हो।
देखो ना दीदी मां , बाबा तो हमेशा लड़ते ही रहते हैं, बाबा हंडिया (चावल से बना पेय जिससे नशा होता है) पी कर आएगा और लुढ़क जाता है , मां चिल्लाती रहती है।
दीपा कितनी सुंदर लग रही है न दीदी।
मैने हामी भरी।
चार पांच दिन हुए , मैं थोड़ा व्यस्त हो गई तो दीना से बात कम हो पा रही थी।
रविवार को मैं अर्चना के घर चली गई ,लौट कर रात हो गई थी।
मैं दौड़ते दीना के पास पहुंची ,मैने देखा दीना खाना बना रहा था।
मुझे देखते ,दीना हड़बड़ा कर बोला _क्या बात है दीदी ?इस समय।
हां दीना ,दीपा कहां है?मैने दीपा को एक आदमी के साथ रेस्तरां में देखा था ,और उसके बाद उसे एक कहीं और निकलते देखा ।
मैने सोचा वो घर आ गई होगी।
मैने एक फोटो निकाल कर दिखाया और उससे पूछा _क्या तुम इसको जानते हो?
दीना ने गौर से देखा _और कहने लगा ,नहीं दीदी हम इसको नहीं जानते।
रात के 8 बज गए थे,इतनी देर तो कभी भी दीपा नहीं करती थी।
वह अपने मां,बाबा पर गुस्सा करने लगा ,बहुत चढ़ा के रखा है दीपा को।

मैने कहा _मैं भी चल रही हूं,तुम पता नहीं कहां कहां खोजोगे।

और मैं उसके साथ निकल गई।
क्रमशः