झारखंड जिस पर ईश्वर ने जम कर खूबसूरती बरसाई है।कल_कल करते झरने,छोटे बड़े पठार,सोना उगलती नदियां ,घने वन ,मेहनती ,सीधे साधे अपनी संस्कृति को सहेजे लोग।
झारखंड की राजधानी से 18 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है , पिठोरिया का किला । यह कभी मुंडा और नागवंशी शासकों के सत्ता का केंद्र थी।
दुर्गम भौगोलिक स्थिति के कारण इस क्षेत्र को जीतना उन विदेशी अंग्रेजों के बस में नहीं थी।
अंग्रेजी हुकूमत के समय यहां के सीधे साधे लोगों पर काफी जुल्म बरसाए गए।परिणाम स्वरूप विद्रोह होना तो आवश्यक ही था।
1831 ईसवी में सिंदराय और बिंदराय दो भाईयों के नेतृत्व में कोल विद्रोह का आगाज किया और उन्होंने अंग्रेजों को लोहे के चने चबवा दिए।
उनके इस विद्रोह का दमन करना अंग्रेजो के लिए अत्यंत दुष्कर कार्य था।
इसके लिए अंग्रेजों ने अपनी दोगली नीति चली,वहां के राजा जगतपाल सिंह को अंग्रेज अधिकारी विल्किंगसन ने अपनी सहायता के लिए राजी कर लिया ,इसके एवज में विलियम बेंटिक ने प्रतिमाह 313 रुपए पेंशन आजीवन देने का वचन दिया।
जगतपाल सिंह ने अंग्रेजों का साथ देना स्वीकार कर लिया ,और वहां की सारी जानकारी अंग्रेजों को देने लगे ,इसके कारण कोल विद्रोह का दमन कर दिया गया।
1857 का सिपाही विद्रोह , मेरठ से शुरू हो पूरे देश में आग की तरह फैलने लगा ।
शहर शहर बगावत शुरू हो गई थी।
पिठौरिया इलाके में भी छिटपुट क्रांतिकारियों में विद्रोह करना शुरू कर दिया ,तब उस समय अंग्रेजों ने पिठौरिया इलाके की मजबूत घेराबंदी कर दी ,जिससे क्रांतिकारियों को पीछे हटना पड़ा।
राजा के इस प्रकार के कृत्य से नाराज क्रांतिकारी ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव ने जगतपाल सिंह पर आक्रमण कर दिया। जिसमें विश्वनाथ शाहदेव हार गए ,और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया ।
16अप्रैल 1858 को रांची के जिला स्कूल के सामने कदंब के पेड़ पर उन्हें सार्वजनिक रूप से फांसी दी गई।
उस समय विश्वनाथ शाहदेव ने शाप दिया कि_देशद्रोही ,तुम्हारे वंश का नाश हो जाए,तुम्हारा नाम लेने वाला कोई न बचे।
इस किले हर साल बिजली गिरती रहे जब तक यह पूर्णतः गिर न जाए।
और हुआ भी ऐसा , एक समय अपनी समृद्धि और वैभव को दर्शाता 100 कमरों का आलीशान किला , आज पूरी तरह से खंडहर ,जर्जर हो गया है।हर साल उस किले में अचानक ही बिजली गिरती है ,और उसका कोई न कोई हिस्सा गिरता रहता है।
शाप में बड़ी ताकत होती है ,जो समय के साथ अपना प्रभाव दिखाता रहता है।

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