सांझ कि गोद में सिमट गया उजाला,
हो गयी गगन में अस्ताचल,
दिवाचर भी दिनकर संग चल पड़े,
अपने अपने घर कि राह पर चल पड़े।
खेतों कि हरियाली आसमान कि लालिमा,
दिन कि उजाला भी हो गयी कालिमा।
सरिता के सवल में दिखती सविता की प्रतिछाया,
झीलों के झिलमिलाते पानी में दिखती सुर्य अस्ताचल कि प्रतिबिंब।
पश्चिम में अदृश्य हुआ प्रभाकर,
अस्ताचल कि दृश्य भी ओझल हुआ,
संग अपने दिन के उजाला ले गया,
नये सुबह नये आशा मन को दे गया।
रवि विदा हुआ संध्या के आने से,
सब फिदा हुए कोयल के गानों से।
चीखुर खग कोयल कौआ सब अपने-अपने आलय लौट चले,
तरुवर पर्ण कुसुम खर सब निद्रा कि गोदी में सोने चले।
सुकुन कि मुस्कान स्वयं मुख पर आती है,
जब अस्ताचल को निहारकर मन को सुकून मिलती है।
चलते-चलते सविता सरिता के जलों में मिलते हैं,
जाते-जाते क्षितिज से क्षिति को अंतिम संदेश दे जाते हैं।
सरिता के जलों में निहारना,
सांझ के अकंवारी में बैठा मुझे देखना,
कभी क्षणभर को मुझे ताकना,
झील किनारे या नदी तट से मुझे देखना।
गंगा यमुना के जल में,
मुझे देखना सांझ के बेला में।
अंधकार के जंजीरें तोड़ मैं आऊंगा,
तुम्हारे आंकाक्षा के पुष्प बन खिल जाऊंगा।
कल के सारे शिकवे भुल जाना,
मेरे संग नये मन से आना।
सुबह सवेरे बांस के पर्णों के बीच आऊंगा,
भोर के किरण बनकर मैं आऊंगा।
अकल्पनीय सुंदरता की कल्पना हैं प्रकृति,
मन कि सुकुन की परिभाषा हैं प्रकृति।
एक कविता प्रकृति के नाम।
प्रकृति के सुंदरता पर कविता लिखने का मेरा एक प्रयास आपको कैसा लगा, आपलोग समीक्षा में अवश्य बताएं।
धन्यवाद
–अलका कुमारी “भारती”

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