इस उपन्यास का दूसरा भाग लिखने से पहले मैं आपसे चंद बातें करना चाहती हूं जो मेरे मन में अक्सर आते रहते हैं, मैंने अभी तक जितने भी धारावाहिक लिखे हैं उनमें किसी न किसी सामाजिक समस्या को आधार बनाया गया है । जो घटनाएं हमारे आस पास होती हैं वही मेरे लेखन का विषय होता है । संभव है कि विषयवस्तु उतना रोचक न हो लेकिन उसमें कहीं न कहीं सत्यता अवश्य होती है । हम अपने आस पास न जाने कितने लोगों को देखते हैं जो सब कुछ होते हुए भी जिंदगी को सही ढंग से जी नहीं पाते। हमेशा उनके हिस्से में नाकामी, उदासी और तकलीफें ही आती हैं।और दिन प्रतिदिन ये बढ़ती ही जाती हैं और एक दिन ये शिखर पर पहुंच जाती हैं और वो व्यक्ति उन तकलीफों की आग में तप कर कुंदन बन जाता है ।जैसे सोने को जब आग में तपाया जाता है तो वो राख नहीं होता। वो तो अपने अंदर की सारी अशुद्धियों को बाहर निकाल कर खुद को शुद्धता की कसौटी पर कस लेता है और खरा सोना बन जाता है लोग उसे अपने गले का हार बनाते हैं । सिर माथे पर बिठाते हैं। अपने सीने से लगाते हैं । ऐसे ही जब मनुष्य के लिए तकलीफों की चरम सीमा पार हो जाती है। तब वो उन्हीं तकलीफों को अपनी ताकत बना लेता है। और उनके साथ साथ जीना सीख लेता है अपने आपको वज्र के समान कठोर बना लेता है , तब यही दर्द उसकी शख्सियत को निखार देता है समाज में उसकी एक पहचान बन जाती है। और समाज उसे सम्मान पूर्वक शिखर पर पहुंचा देता है शिखर पर पहुंच कर वो चारों तरफ देखता है तो उसके लिए हर व्यक्ति के मन में श्रद्धा होती है । और वो व्यक्ति तब उन तकलीफों को भूलकर आत्मसंतुष्टि का अनुभव करता है।
अरे! मैं तो भावनाओं में कुछ अधिक ही बह गई, आप लोग सोच रहे होंगे कि मैं कहानी की जगह ये क्या लेकर बैठ गई। साथियों, जो बातें मैने आपसे शेयर की वही सब कुछ इस कहानी में किसी के साथ होने वाला है। कोई है जो इस हद तक जाने वाला है कि बर्बरता की सीमाओं को पार कर दे, और कोई ऐसा भी है जो सहनशक्ति की सीमा लांघ जाता है। तो आइए ले चलते हैं आपको कहानी की दुनिया में, जिसका नाम है -
"एक टुकड़ा धूप का"
अभी तक आप सभी पाठक सृजन के साथ इलाहाबाद की सड़कों की सैर कर रहे थे। कभी चाय पकौड़ी की दुकान पर , तो कभी सब्जी वाले के ठेले पर। कभी भुनी हुई मूंगफली अमरख की चटनी के साथ खा रहे थे तो कभी लईया चना। फिर आप कुछ सेकंड में पहुंच गए अहमदाबाद । जहां पर सृजन के साथ साथ हम मिलते हैं सिस्टर मारिया से जो एक आश्रम की संचालिका हैं। उन्होंने सृजन को एक डायरी दी थी जिसे उसको उसके असली हकदार तक पहुंचाने को कहा था। सृजन तब से उस डायरी को उस व्यक्ति तक पहुंचाने के लिए लगातार कोशिश कर रही थी । उसमें उस व्यक्ति का पता तो लिखा नहीं था कि वो उस पते पर जाकर डायरी दे देती। बस उसका नाम और इलाहाबाद लिखा था। अब इतने बड़े शहर में वो उसे कैसे ढूंढे? उस नाम के तो हजारों व्यक्ति हो सकते थे। उसने ये बात सिस्टर मारिया से कही भी थी
तब उन्होंने उससे यही कहा था
"सृजन, मैने भी यही सवाल उससे पूछा था कि उसने उसका पता क्यों नहीं लिखा सिर्फ नाम ही क्यों लिखा? तो उसने मायूसी से यही जवाब दिया कि उसका पता जानने की उसने कभी कोशिश ही नहीं की । क्योंकि उसे उसकी जिंदगी से बहुत दूर रहना था । पर यह डायरी उसकी अमानत है । जब भी इसका समय आएगा ये डायरी उसके पास पहुंच जाएगी और इसे पहुंचाने का काम आपको ही करना होगा सिस्टर। मेरा इस दुनिया में कोई नहीं है जिसे मैं अपना कह सकूं। आप ही मेरी मां हैं आप ही मेरी दोस्त हैं आप ही सब कुछ है मेरी। और मुझे पूरा यकीन है कि आप मेरी यह इच्छा जरूर पूरी करेंगी। उसने इतनी उम्मीद से मुझसे कहा था कि मैं इनकार कर ही नहीं सकती थी। "सिस्टर मारिया ने अपना चश्मा निकाल कर अपनी आंखें पोछी। ना जाने कौन सी बात उन्हें याद आ गई थी कि उनकी आंखों से आंसू निकल आए।
सृजन का दिल भी भर आया, वो डायरी सही जगह पहुंचाने के लिए तैयार हो गई। वो समझ गई कि वो डायरी किसी के लिए बहुत कीमती है किसी के जीवन की पूंजी है किसी का इंतजार हो सकता है या किसी का प्यार भी हो सकता है, किसी के जिंदगी की दास्तान भी हो सकती है या किसी पर मेहरबान भी हो सकती है।वो डायरी उसके लिए एक अनसुलझा रहस्य थी जो उसकी उत्सुकता बढ़ा रही थी । अक्सर वो उस डायरी को पढ़ना चाहती लेकिन फिर अपने आपको रोक लेती वो खुद को समझाती कि किसी की पर्सनल डायरी पढ़ना बहुत ही गलत बात है। और उसके संस्कार ऐसे नहीं थे कि वो किसी का राज चोरी छुपे जानने का प्रयास करती। उसने ठान लिया था कि वो उस व्यक्ति को जरूर ढूंढकर रहेगी जिसके लिए ये डायरी लिखी गई है। तब वो उसी से जानने का प्रयास करेगी कि आखिर क्या छिपा हुआ है इस डायरी के पन्नों में।
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सिस्टर मारिया का आज किसी काम में मन नहीं लग रहा था , आज वो अपने ऑफिस से निकल कर उसी पार्क की उसी बेंच पर बैठी हुई थीं जहां वो बैठा करती थी कुछ सूखे पत्ते उस बेंच पर फैले हुए थे। सिस्टर मारिया ने उस बेंच पर हाथ फेरा मानो उसका स्पर्श महसूस कर रही हो। ऐसा लगा उन्हें मानो वो एक शॉल ओढ़ कर बैठी डायरी लिख रही है, उसके बालों की लट आवारा होकर झूल रही है। वो बार बार उन्हे संभालती और फिर मुंह में पेन दबाकर कुछ सोचने लगती और फिर लिखने में जुट जाती । उस समय उसका चेहरा बिलकुल शांत रहता मानो कोई धीर गंभीर सागर हो। अचानक एक हवा का झोंका आया मानो उसने धन्यवाद कहा हो उनको। सिस्टर मारिया ने चौंक कर इधर उधर देखा मगर वहां तो कोई नहीं था।
आखिर कौन थी वो?
जानने के लिए ढूंढते रहिए उसके लिए
एक टुकड़ा धूप का
लेखिका
संगीता शर्मा" प्रिया"

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