वो विस्तृत है
उसे सीमा में न बांधों तुम
अनंत है बहुत
उसे बह जानें दो
चंद शब्दों में न ढालो तुम....

एहसास है वो इक
उसे बस महसूस कर 
उसमें बह जाना है
छोड़ अंत और आरंभ को
उसमें रम जाना है....

इक क्षण ही होता है वो बस
जब होता है भक्ति का एहसास
जहां ज्ञात ये होता है
कि कुछ खोने के बाद भी मुस्कराना
भक्ति का दूसरा रूप होता है....

होती हैं जहां चाह सारी शून्य
मद भी कहीं विलीन होता है
त्याग कर अपने पराए का भाव
हर कोई एक जब लगता है....

घंटों जप कर हरि का नाम
रख कर मन में मलिनता
ये भक्ति तो नहीं
ये तो बस संतुष्टि है....

एक कर्तव्य को मात्र 
पूर्ण कर लेने की
ये विचारकर कि
भज लिया हरि का नाम
कर लिया पूर्ण आज का काम....

भक्ति तो कभी न खत्म
होने वाली वो बहती धारा है
जो बहती है अनंत
हो परे हमारे प्रारब्ध से
न कोई इच्छा फिर बाकी रहती है
जब हमें भक्ति की सही
परिभाषा ज्ञात होती है ....

इसीलिए सच है कि
वो तो विस्तृत है
उसे सीमा में न बांधों तुम
अनंत है बहुत
उसे बह जानें दो
चंद शब्दों में न ढालो तुम ।।
© कविता गौतम...✍️