क्या बताये कि क्या अनमोल रत्न है बेटी
बेटे अगर फूल हैं तो पूरा चमन है बेटी
ये जो आँगन में चले सारा घर खनकता है,
ये जो हंसती है तो लगता है घर चहकता है।
इनकी बोली में जैसे मिश्री सी घुल जाती है,
इनकी होने से ही ये जिंदगी मुस्काती है।
पापा की लाडली मम्मी की परी है बेटी,
दादा का चश्मा है दादी की छड़ी है बेटी।
ये आपने आप मे लक्ष्मी का रूप होती है बेटी,
ये दुर्गा,काली और सीता का रूप होती है बेटी।
कभी माता,कभी पत्नी,कभी बेटी बहना,
ये जिस घर मे है उस घर का भला क्या कहना।
आपने हर फर्ज को हंस के निभाती बेटी,
प्यार बेटो की तरह नही पाती बेटी।
धरती तक नही आकाश भेद आती है,
दोनों ही कुल का ये सम्मान तब बढ़ाती है।
बेटा बेटी का भेद भाव को मिटाना होगा,
बेटो से कम नही बेटी ये समझना होगा।
आप के बंस का कुलदीप जलाती बेटी,
जाने क्यों फिर भी मगर कोख में मरती बेटी।।।
✍️✍️✍️✍️प्रितम वर्मा💔💔💔💔💔💔💔💔💔💔💔💔💔💔💔💔💔

1 टिप्पणियाँ
बहुत अच्छी कविता कही है