कुछ जो पीकर शराब लिखते है बहक कर वह हिसाब लिखते है
जैसे खामिर उठता है ,अच्छा लिखते है खराब लिखते है
रुख से पर्दा उठा के दर पर्दा,हुस्न को बेनकाब लिखते है
होश लिखने का नही होता,फिर भी मेरा जनाब लिखते है
साकी पैमाना सागरो मीना, सारे देकर खिताब लिखते है
आपने महबूब के तसौवूर को,खूब हुस्नो शबाब लिखते है
लिखने वालों की बात क्या कहिये,जब ये बनकर नवाब लिखते है,,
यार लिख डाले जहर को अमृत,आग को आफताब लिखते है
जो भी मसला नजर में हो इनकी,ये उसी का जबाब लिखते है

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