अपना घर बहुत जरूरी है।भसिर्फ नारी के लिए नहीं पुरुष के लिए भी जरूरी है।
गर वो एक बेटा है तो उसके पिता कह सकते हैं निकलो मेरे घर से। पिता हुआ तो बेटा कह देता है निकलो मेरे घर से।
आज़ मैं बताती हूं।

एक नेत्रहीन बुजुर्ग जिनकी पत्नी की मृत्यु के बाद उनके बहू और बेटे राजा ने पास के मंदिर में उन्हें छोड़ दिया यह कहकर आप यहां रहिए घर में जगह कम है और छोटे-छोटे बच्चे हैं।
आप का भोजन मैं आपको यही पहुंचा दूंगा।
वही सरोवर में स्नान कराके पुत्र रोज भोजन करवा कर खेत में काम करने चला जाता था।

बहुत सालों तक वह वहीं उसी मंदिर में प्रभु के चरणों में रहने लगे। आंखों से कुछ देख नहीं सकते थे तो कहीं और जा भी नहीं सकते थे।
बस प्रभु का नाम जपते रहते थे।
एक दिन मूसलाधार बारिश के कारण खेत में काम करते वक्त भीग जाने के कारण। उनका पुत्र राजा बहुत बीमार हो गया।
बीमार था काम पर जा नहीं पाया कुछ दिनों में ही घर में खाने के लिए अनाज खत्म हो गया।
घर भुखमरी की स्थिति हो गई। दो बच्चों सहित राजा दोनों पति-पत्नी और पिताजी पांच लोगों का भोजन कैसे कहां से आएगा।
बारिश अपने चरम पर खेत में बाढ़ से सारी फ़सल बर्बाद हो गई। स्थिति बद से बदतर होती गई।

एक दिन ऐसा आया बच्चों सहित सब भुखे ही सो गए।
परन्तु बुजुर्ग पिता रात भर नहीं सोए बस प्रभु से कहते रहे मेरे पुत्र को जल्दी भेज दीजिए भोजन लेकर मुझे भूख लगी है।
हल्की सी आहट पर कहते आ गया मेरा राजा बेटा।
ला भोजन दे बहुत भूख लगी है।
रात्रि बारह बजे उनके लिए भोजन आ गया छप्पन प्रकार के फूल के थाल में परोसे फूल के बड़े-बड़े कटोरे में।
बुजुर्ग नेत्रहीन उन्हें पता ही नहीं चला किसने भोजन दिया।
वो अपने हाथों से छूकर जब भोजन को देखते हैं
उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ। इतना भोजन इतने पकवान किस खुशी में बनाए। उन्होंने पूछा भी पर किसी ने कोई जवाब नहीं दिया।
उन्होंने भोजन कर लिया और बचे हुए भोजन को ढ़क कर रख दिया।
सुबह राजा चिंता करने लगा भोजन का प्रबंध कैसे करें। राजा हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था पिता के सामने बिना भोजन लिए जाने का। फिर भी उसने अपने बेटे को दादा जी को स्नान कराने के लिए भेज दिया और कहा रात्रि के लिए क्षमा मांग लेना।
सुबह उनका पोता जब स्नान कराने के बाद क्षमा मांगने लगा तो उन्होंने कहा।
रात्रि का भोजन बहुत ही स्वादिष्ट था।
ऐसा भोजन मैंने जिंदगी में पहली बार किया।
किसने बनाया और किस खुशी में इतने पकवान बनाए थे।
पोत्र को लगा दादाजी ताना दे रहे हैं रात्रि भोजन नहीं दिया इसलिए। दादाजी ने जब दुबारा कहा।
बहुत ज्यादा भोजन दे दिया था रात्रि को बहुत सारा बच गया है लेकर जाओ मैंने ढ़क कर रख दिया है। पोत्र के आंखों से अश्रु धार बहने लगे।
हाथ जोड़कर कहने लगा दादाजी हम लोगों ने भी कुछ नहीं खाया हम लोग भी भूखे ही सो गए।
घर में भोजन का एक दाना भी नहीं है।
मैं सच कह रहा।
पर जब दादाजी बार बार भोजन की तारीफ करने लगे, तो पोत्र मंदिर के अंदर दादाजी को बिठाकर अपनी नज़र आस पास घुमाने लगा।
वही फूल के थाल में कटोरी से सजी हुई भोजन देख कर आश्चर्यचकित रह गया।
और प्रसन्न होकर भोजन लेकर घर आया।
और अपने पिता को सब कुछ बताया।
राजा इतने सुन्दर फूल के बर्तन उसने कभी नहीं देखे थे ना अपने घर में ना आस पास किसी और के घरों में। राजा मन ही मन सोचने लगा आखिर किसके घर रात को कोई उत्सव हुआ। किसने मेरे पिताजी को भोजन दिया होगा।
प्रभु को धन्यवाद करते हुए। उसके पिता भूखे नहीं सोए।
पूरे गांव में घर-घर जाकर पूछने लगा किसने मेरे पिताजी को रात में भोजन दिया। आप यह बर्तन रख लीजिए और मैं आपका जीवन भर ऋणी रहूंगा। सभी लोगों ने कहा हमने नहीं दिया। और न ही गांव में कोई उत्सव हुआ है।
आस पास के गांव में भी इस बात की चर्चा होने लगी किसने राजा के पिताजी को फूल के थाल में छप्पन प्रकार के भोजन दिए।
किसीने नहीं देखा पर सबूत है वो फूल थाल और कटोरा जो कह रहा प्रभु अपने दरवाजे पर किसी को भूखे नहीं सोने देते।
               अम्बिका झा ✍️